मनुष्य योनि से देवयोनि की यात्रा - मनुष्य एक भटका हुआ देवता

Acharya Rekha Kalpdev | 05-Apr-2024

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पास और दूर दोनों को अनदेखा करने का स्वभाव मनुष्य का सदैव से ही रहा है, मनुष्य स्वभाव है कि जो उपलब्ध है उसका मूल्य शून्य है, जो उपलब्ध नहीं है, उसी का मूल्य है। मनुष्य जीवन मिला उसका मूल्य मनुष्य ने नहीं जाना, जो मनुष्य योनि में नहीं है, उन योनियों से यदि पूछा जाए तो हम जान पाएंगे, कि मनुष्य योनि कितनी उपयोगी है। अनेकोनेक योनियों में भटकने के बाद हम जिस योनि में आये, उस योनि के प्रत्येक क्षण को हम खाने, पीने और सोने में व्यथ कर रहे हैं। मनुष्य जन्म अनमोल था, कौड़ी बदले जाए। ईश्वर मनुष्य को धरा पर जन्म देकर, पुण्य अर्जित करने के लिए भेजता है। मनुष्य है कि अपना मूल्य उद्देश्य, भूल जाता है, और भौतिक सुखों, सांसारिक विषयों में सुख तलाशने के लिए एक बहुत शून्य चक्र में चक्कर लगा रहा होता है।
मनुष्य को जिस शून्य चक्र के ऊपर होना चाहिए, कि वो इस जन्म की जीव यात्रा पर कहीं पहुंच पाए, कुछ अर्जित कर पाए, मनुष्य उस शून्य चक्र के बाहर न होकर उसके भीतर होता है। और एक वृत्त के अंदर हम कितने भी चक्कर लगा लें, पहुँचते कहीं नहीं है। ऐसे ही सब बस भाग रहे है, चल रहे है, चक्कर काट रहे है, पर एक वृत्त के अंदर है, एक शून्य के अंदर है। काश मनुष्य ने जितनी ऊर्जा इस चक्कर के भीतर चक्कर लगाने में लगाईं, उतनी ऊर्जा यदि वो उस शून्य चक्र से बाहर निकलने में लगता तो निश्चित रूप से इस जन्म जन्म के चक्र को तोड़कर मोक्ष यात्रा पर निकल गया होता।

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एक अज्ञानी, एक मजदूर या एक आम व्यक्ति जो कभी सत्संग में नहीं गया, जिसने शास्त्र नहीं पढ़े, उसे भी यह ज्ञान है कि सुख दुःख सब अपने ही किसी जन्म के कर्म के कारण है। एक अज्ञानी भी यह जानता है कि ईश्वर हमारे अंदर है, प्रत्येक जीव में एक आत्मा है। ईश्वर को पाने का सबसे सरल मार्ग, पुण्य मार्ग पर आगे बढ़ना है। पुण्य सत्संग और संगती से आता है, शास्त्रों के अध्ययन से आता है, धार्मिक ग्रंथों को पढ़ने से आता है। मनुष्य जीवन सत्मार्ग पर चलते हुए महान बनने के लिए है। मनुष्य को मनुष्य योनि से आगे बढ़कर देवयोनि में प्रवेश करने का प्रयास करना चाहिए। मनुष्य योनि में आकर भी जो सिर्फ अपना और अपने परिवार का ही भला करता है, वह मनुष्य योनि से ऊपर कभी नहीं उठ पाता है। अपने साथ जो अनेकों को देव योनि के मार्ग पर अग्रसर करता है, वही सच्चा मनुष्य है। उसी ने मनुष्य योनि को सार्धक किया है। जहाँ प्रत्येक मनुष्य के पास एक अवसर होता है की वो मनुष्य योनि को देव योनि में बदल दे, वहीँ मनुष्य इस अवसर को खो देता है। और अपनी मनुष्य योनि को भी खो देता है।

जिस प्रकार ब्रह्माण्ड के सूक्ष्म रूप अणु में एक पूरा ब्रह्माण्ड समाया होता है, ठीक उसी प्रकार एक मनुष्य में ईश्वरतत्व समाया होता है। सनातन धर्म को तपस्वी, योगियों, ऋषि, मुनियों, संत महात्माओं ने ही संभल रखा है। इस सृष्टि का मूल सनातन ही है। कहने का अर्थ यह है कि सनातन धर्म शाश्वत और सत्य है, बाकि सब मिथ्या है। जिस प्रकार एक हिरन कस्तूरी की तलाश में वन वन भटक रहा होता है, जबकि कस्तूरी उसके अंदर ही होती है, ठीक वैसे ही हम सब ईश्वर को यहाँ वहां, तलाश रहे है, जबकि ईश्वर तत्व हमारे अंदर ही है। सिद्धि और महासिद्धि पाने वाली ज्ञानियों ने भी यही जाना है कि ईश्वर हमारे अंदर ही है। हमारे चारों और है।

भगवान् श्री कृष्ण जी ने भी गीता में कहा कि जिसकी जैसी श्रद्धा होती है, उसे वैसा ही मिलता है। जिसने अपने व्यक्तित्व को महान बनाया है, महानता के मार्ग पर जो चला है, उसे महानता प्राप्त हुई ही है। जीवन में अज्ञान का अंधकार हो तो व्यक्ति रस्सी को भी सांप समझ लेता है। जैसे ही कमरे में प्रकाश हो जाये तो रस्सी और सांप का अंतर समझ आ जाता है। हम सभी पर आसपास के माहौल का असर पड़ता है। कोई शावक यदि भेड़ों के झुण्ड में पीला बढे तो शावक का व्यवहार भी भेड़ों जैसा हो जाता है। आत्मबोध, आत्मचिंतन ही सच्चा प्रकाश है। जिस दिन आत्मबोध हो जाता है, उसी दिन उसके जीवन का भटकाव रुक जाता है। मनुष्य मन पर जन्म जन्मान्तरों के कर्मों की जो धुल चढ़ गई है, उसे ज्ञान के प्रकाश से ही हटाया जा सकता है। जिस प्रकार एक जलते कोयले पर राख बैठ जाती है तो जलता कोयला भी राख प्रतीत होता है, उस कोयले के ऊपर से राख की परत हटा दी जाये तो कोयले में छुपी अग्नि स्पष्ट सामने आ जाती है, ठीक उसी प्रकार हम सब के मन पर भी लोभ, मोह और माया की कालिख लग गई है, जिसे आध्यात्म के ज्ञान से हटाया जा सकता है।

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मनुष्य के अंदर बैठे ईश्वरतत्व का चुम्बक उसे बीच बीच में उसे देवयोनि में जाने के लिए प्रोत्साहित करता रहता है। जैसे एक नदी का जल किसी भी दिशा से अपनी यात्रा शुरू करें अंततः वह सागर के जल में ही समापित होता है। सागर की जलराशि विशाल मात्रा में होने के कारण, नदी के जल को अपनी और अपने बल से खींचती है। जल में भी एक प्रकार का गुरुत्वाकर्षण बल होता है जो जल को, जल की और खींचता है। जलाशय गहरा हो तो आसपास का जल खुद से बहकर जलाशय के निकट आ जाता है। ईश्वर किसी फूल, माला और भोग से प्रसन्न नहीं होता है, उसे आपका भाव और श्रद्धा, आपके अंदर का ईश्वरतत्व ही अपना बना सकता है। शीतकाल में पहाड़ की चोटियों पर बर्फ जमा होना आम है, सूरज की गर्मी लगने से बर्फ पिघलती भी है। आदर्शों का पालन करने पर व्यक्ति देवयोनि की और एक कदम बढ़ाता है। अपने चिंतन, चरित्र और व्यवहार में जो नैतिक हो गया। जिसने अपने में ये तीनों गुणों को साध लिया, वो देवयोनि में आगे बढ़ गया। ईश्वर के आगे विनती करने से, मांगने और गिड़गिड़ाने से मनुष्य योनि अपमानित होती है। स्वयं को देवत्व प्राप्ति की और अग्रसर करना ही मनुष्यत्व है। गंगा, यमुना, सरस्वती नदियां जहाँ मिलती है, वह संगम बनता है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश महेश त्रिदेव कहलाते है। मृत्यु लोग, पाताल लोक और स्वर्ग लोक तीन लोक है।

शरीर का पोषण भोजन है, आत्मा का भोजन भजन है। चिंतन, चरित्र और व्यवहार को शुद्ध कर ही आप ईश्वर को पा सकते है। चिंतन, चरित्र और व्यवहार को शुद्ध करने का तरीका संगत, सत्संग, और धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना है, आत्मसात करना है। जैसे साफ़ कपडे को ही रंगा जाता है, उसके लिए ईश्वर कैसे दरवाजे खोल सकता है। सिद्धि, मुक्ति, तृप्ति और शांति का मार्ग उन्हीं के लिए खुलता है जिनका मन निर्मल हो, शुद्ध हो, स्वच्छ हो, उन्हें ही ईश्वर मिलता है। नरपशु से नरदेव बनने की यात्रा अपने हृदय की धुलाई से ही शुरू होती है। जिनके घर की अलमारी का सामान अस्त-व्यस्त है, उनका जीवन कैसे व्यवस्थित हो सकता है। आज भी प्रत्येक मनुष्य को जीव जंतुओं, पशु पक्षियों और पेड़ पौधों से बहुत कुछ सिखने की आवश्यकता है। पशु पक्षियों की जीवनचर्या प्रत्येक दिन की निश्चित होती है। सभी पशु पक्षी समय से उठते है और समय से सोते है, सूरज उगे भोजन की तलाश में घर से निकलते है, और सूरज ढले अपने घर वापस लौटते भी है। उनका सब कुछ नियमित है, मनुष्य एक मात्र ऐसा प्राणी है जिसका कुछ भी निश्चित नहीं है। मनुष्य प्रकृति और नियमों को अपने ढंग से बदलता रहता है। इसलिए आज अशांत है, दुखी है, पेड़ इसलिए फल दे पाते है क्योंकि वो अपनी जड़ों से जुड़े रहते है, जड़ों से उन्हें जीवनरस मिलता है, जिसे वो सोखकर तनों, टहनियों और पत्तियों तक पहुंचाते है। इसी जीवन रस से पेड़ में फूल और बाद में फल आते है। ईश्वर भी हमारा मूल है, हमारी जड़ है, इसी मूल से जीव योनि जीवित है, पोषित है। मनुष्य को देव बनने की यात्रा में तीन मार्गों से होकर गुजरना पड़ता है, उपासना, साधना और आराधना। ये तीनों ही एक दूसरे से जुड़े है। एक दूसरे के पूरक है। एक के बिना दूसरे का कोई अस्तित्व नहीं है। आत्मचिंतन और आत्मशोधन आत्मशुद्धि का पहला चरण है। यहीं से उपासना, साधना और आराधना शुरू होती है। सिद्ध होती है, सफल होती है।

मनुष्य जीवन तीन विषयों से चलता है। आत्मा, शरीर और वस्तु। आत्मा और शरीर दो तत्व मनुष्य जन्म के साथ लेकर पैदा होता है, तीसरा विषय पदार्थ या वस्तु की प्राप्ति और संग्रह में मनुष्य सारा जीवन निकाल देता है। अंत समय में केवल आत्मा मुक्त होती है, वही परब्रह्म में समाती है। शरीर निष्क्रिय हो जाता है और वस्तु व्यर्थ हो जाती है। मन शुद्धि के बाद ही ईश्वर प्राप्ति संभव है, अन्यथा मनुष्य देवता बनने की यात्रा में सारा जीवन भटकता ही रहता है, भटकता ही रहेगा।