नवरात्र का तीसरा दिन: ऐसे करें मां चंद्रघण्टा की आराधना, जानिए, पूजा विधि, महत्व, मंत्र और आरती

Indian Astrology | 26-Mar-2020

Views: 494

नवरात्र का तीसरा दिन मां चंद्रघंटा को समर्पित है। माता चंद्रघंटा देवी दुर्गा की तीसरी शक्ति हैं। इस देवी के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है इसीलिए इनका नाम चंद्रघंटा है। इन्हें स्वर की देवी भी कहा जाता है। इनके चण्ड भयंकर घंटे की ध्वनि से सभी दुष्टों, असुरों, दैत्य-दानवों का नाश होता है। इस दिन साधक का मन मणिपूर चक्र में प्रविष्ट होता है। इनका उपासक सिंह की तरह पराक्रमी और नर्भय होता है। इनके घंटे की ध्वनि सभी प्रेतों और बुरी शक्तियों को इनके भक्तों से दूर रखती है। यदि मां चंद्रघंटा की विधि विधान से आराधना की जाए तो मां जल्दी ही कष्टों का निवारण कर देती हैं। तो आइए, आपको बताते हैं मां चंद्रघंटा की कथा, उपासना विधि, मंत्र, स्तुति, स्रोत पाठ, आरती, उनके स्वरूप और महत्व के बारे में।

मां चंद्रघंटा की उत्पति और स्वरूप

भारतीयों में हमेशा से ही ईश्वर के प्रति गहरी आस्था रही है। भारतीय धर्मग्रंथों में तमाम देवी-देवताओं के महात्म्य और उनकी उत्पत्ति के बारे में विस्तार से बताया गया है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार धरती पर सुख-समृद्धि देवी-देवता के बिना संभव नहीं है। कुटिल, दुष्ट भयंकर व राक्षसी प्रवृत्तियां संसार में व्याप्त होकर धर्म और मानवता को हमेशा नुकसान पहुंचाने में लगी रहती हैं। इनकी दुष्ट शक्तियों का नाश करने के लिए ही मां दुर्गा नौ रूपों में प्रकट हुईं। माता चंद्रघंटा की उत्पत्ति देवी दुर्गा की तीसरी शक्ति के रूप में हुई। मां भक्तों की पीड़ा, भय और दु:खों का नाश करने वाली हैं। भक्त जनों के मनोरथ को पूर्ण करने वाली हैं। मां दुर्गा का यह रूप कई प्रकार की वस्तुओं और दिव्य ध्वनियों को प्रसारित करने वाला है। 

माता चंद्रघंटा का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। इनके तीन नेत्र और दस हाथ हैं। अपने कर-कमलों में वे कमल व कमण्डल के अलावा गदा, बाण, धनुष, त्रिशूल, खड्ग, चक्र, खप्पर आदि कई अस्त्र-शस्त्र लिए हुए हैं। माथे पर बना आधा चांद इनकी पहचान है। इसी अर्ध चांद की वजह से ही इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। मां अपने वाहन सिंह पर सवार हैं और तमाम अस्त्र-शसत्रों के साथ शत्रुओं का नाश करने के लिए तत्पर हैं।

मां चंद्रघंटा की पूजा का महत्व

मां चंद्रघंटा की उपासना करके साधक अपने पापों का प्रायश्चित करता है जिससे उसके समस्त कष्ट और बाधाएं ख़त्म हो जाती हैं। मां चंद्रघंटा की कृपा से साधक पराक्रमी और निर्भय बनता है। मां अपने भक्तों की सभी नकारात्मक शक्तियों और प्रेतबाधा से रक्षा करती हैं। इनकी उपासना से साधक में वीरता और निर्भयता के गुणों के साथ ही सौम्यता और विनम्रता का भी विकास होता है। उसके मुख, नेत्र और संपूर्ण काया का भी विकास होता है। मां चंद्रघंटा की आराधना से साधक तृष्णा और लोभ पर विजय प्राप्त कर समस्त सांसारिक कष्टों से मुक्त हो जाता है। मान्यता है कि माता चंद्रघंटा शुक्र ग्रह को नियंत्रित करती हैं। इसलिए इनकी उपासना करने से शुक्र ग्रह से संबंधित सभी दोष दूर होते हैं।  


नवदुर्गा पूजा की ऑनलाइन बुकिंग के लिए क्लिक करें।


मां चंद्रघंटा की उपासना विधि

मां चंद्रघंटा की पूजा नवरात्र के तीसरे दिन शास्त्रीय नियमानुसार पूरे विधि विधान से की जाती है। शारीरिक शुद्धता के साथ-साथ मन की पवित्रता के साथ यह पूजा करनी चाहिए। इसके लिए प्रात: जल्दी उठकर स्नान करके सबसे पहले मां चंद्रघंटा की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए। उनकी पूजा करते समय उन्हें विविध प्रकार के सुगन्धित पुष्प, ख़ासकर लाल पुष्प और इत्र ज़रूर अर्पित करने चाहिए और उन्हें विभिन्न प्रकार के नैवेद्य चढ़ाने चाहिए। ऐसा करने से साधक को वांछित फलों की प्राप्ति होती है। शरीर में उत्पन्न पीड़ाओं का नाश होता है।

इस दिन की पूजा में दूध की प्रधानता होती है। इसलिए पूजन के बाद ब्राह्मणों को दूध देना उचित माना जाता है। इस दिन सिंदूर लगाने का भी रिवाज है। मां चंद्रघंटा को दूध और दूध से बनी चीज़ें बहुत पसंद होती हैं इसलिए उन्हें दूध और मखाने की खीर का भोग लगाना श्रेयस्कर माना गया है। इसके अलावा मां को लाल सेब ज़रूर चढ़ाएं।

मां चंद्रघंटा की पूजा में घंटे और ध्वनियों का बहुत महत्व होता है। इसलिए मंत्र पढ़ने और भोग लगाने के दौरान मंदिर की घंटी ज़रूर बजाएं। मान्यता है कि घंटे की ध्वनि से मां चंद्रघंटा प्रसन्न होती हैं और भक्तों को अपना आशीर्वाद देती हैं। उनके सभी कष्ट दूर कर उनकी हर मनोकामना पूर्ण करती हैं। इसके अलावा इस दिन अपने सामर्थ्य के अनुसार दुर्गा सप्तशती का पाठ (Durga Saptashati Path) भी करवाएं। इस पाठ को कराने से आपके स्वास्थ्य, धन, वैवाहिक एवं पारिवारिक जीवन से संबंधित सभी समस्याएं दूर होती हैं और आप तनाव मुक्त होते हैं।

माता चंद्रघंटा की व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार देवताओं और असुरों के बीच लम्बे समय तक युद्ध चला। देवताओं के स्वामी इंद्र थे जबकि असुरों का स्वामी महिषासुर था। महिषासुर ने देवताओं पर विजय प्राप्त करके इंद्र का सिंहासन हासिल कर लिया और स्वर्ग लोक पर राज करने लगा। महिषासुर के अत्याचारों से परेशान होकर  देवगण त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास गएं।

देवताओं ने उन्हें बताया कि महिषासुर ने इंद्र, चंद्र, सूर्य, वायु और अन्‍य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए हैं और उन्‍हें बंधक बनाकर स्‍वयं स्‍वर्गलोक का राजा बन गया है। महिषासुर से परेशान होकर वे अब पृथ्वी पर विचरण करने लगे हैं क्योंकि उनके लिए स्वर्ग में अब कोई जगह नहीं है।

यह सुनकर ब्रह्मा, विष्णु और भगवान शंकर को बेहद क्रोध आया। उनके क्रोध से जो ऊर्जा उत्पन्न हुई वह समस्त देवताओं के क्रोध से उत्पन्न हुई ऊर्जा से जा मिली और दसों दिशाओं में व्याप्त होने लगी।

तभी वहां एक देवी का अवतरण हुआ। इस देवी को भगवान शिव ने त्रिशूल और भगवान विष्णु ने चक्र प्रदान किया। इसी प्रकार अन्य देवी-देवताओं ने भी मां के विभिन्न हाथों में अलग-अलग अस्त्र पकड़ा दिए। इंद्र ने अपना वज्र और एरावत हाथी से उतारकर घंटा दिया। सूर्य ने अपना तेज, तलवार और सवारी के लिए शेर दिया।

इस तरह देवी महिषासुर से युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार हो गईं। उनका विशालकाय रूप देखकर महिषासुर समझ गया कि अब उसका काल आ गया है। महिषासुर ने अपनी सेना को देवी पर हमला करने के लिए कहा। अन्य दैत्य और दानवों के दल भी इस युद्ध में कूद पड़े। लेकिन मां चंद्रघंटा के आगे कोई नहीं टिक सका। मां ने एक झटके में ही सभी असुरों का संहार कर दिया। इस युद्ध में महिषासुर समेत कई बड़े दानव और राक्षस मारे गएं। इस तरह माता चंद्रघंटा ने सभी देवताओं को असुरों से बचा लिया।

मंत्र

ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥

 प्रार्थना

पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।

प्रसादं तनुते मह्यम् चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥

माता चंद्रघंटा की स्तुति

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

ध्यान मंत्र

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।

सिंहारूढा चन्द्रघण्टा यशस्विनीम्॥

मणिपुर स्थिताम् तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।

खङ्ग, गदा, त्रिशूल, चापशर, पद्म कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥

पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।

मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥

प्रफुल्ल वन्दना बिबाधारा कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।

कमनीयां लावण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥

स्रोत पाठ

आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्।

अणिमादि सिद्धिदात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥

चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टम् मन्त्र स्वरूपिणीम्।

धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥

नानारूपधारिणी इच्छामयी ऐश्वर्यदायिनीम्।

सौभाग्यारोग्यदायिनी चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥

आरती

जय माँ चन्द्रघण्टा सुख धाम। पूर्ण कीजो मेरे काम॥

चन्द्र समाज तू शीतल दाती। चन्द्र तेज किरणों में समाती॥

मन की मालक मन भाती हो। चन्द्रघण्टा तुम वर दाती हो॥

सुन्दर भाव को लाने वाली। हर संकट में बचाने वाली॥

हर बुधवार को तुझे ध्याये। श्रद्दा सहित तो विनय सुनाए॥

मूर्ति चन्द्र आकार बनाए। शीश झुका कहे मन की बाता॥

पूर्ण आस करो जगत दाता। कांचीपुर स्थान तुम्हारा॥

कर्नाटिका में मान तुम्हारा। नाम तेरा रटू महारानी॥

भक्त की रक्षा करो भवानी।

शुभ रंग

मां चंद्रघंटा की पूजा के लिए तीसरे दिन भूरे रंग के वस्त्र धारण करें। भूरा रंग व्यक्ति को भ्रम और असमंजस की स्थिति से मुक्ति दिलाता है।


नवरात्र के पर्व से संबंधित ज्योतिषीय उपाय जानने के लिए इंडियन एस्ट्रोलॉजी के ज्योतिषाचार्यों से परामर्श प्राप्त करें।