नवरात्र का पहला दिन: कलश स्थापना के साथ ऐसे करें मां शैलपुत्री की पूजा

Indian Astrology | 25-Mar-2020

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सिर पर मुकुट, माथे पर बिंदी, कमल सी कोमल, त्रिशूल सी घातक, पर्वत सी अटल, कुछ ऐसा मां शैलपुत्री का स्वरूप...

नवरात्र में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। मां दुर्गा के पहले स्वरूप को देवी शैलपुत्री के नाम से जाना जाता है। बैल पर सवार मां शैलपुत्री का स्वरूप बेहद अद्भुत है। भक्त उन्हें वृषारूढ़ा, उमा, सती आदि कई नामों से जानते हैं। मां अपने हाथ में सदैव त्रिशूल धारण करती हैं। इसी त्रिशूल से वे शत्रुओं का नाश करती हैं। अपने दूसरे हाथ में वे कमल का फूल लिए हुए हैं जो उनके शांत और कोमल स्वभाव का प्रतीक है। मां शैलपुत्री सौभाग्य की देवी हैं जो अपने भक्तों के जीवन से अंधकार व अज्ञानता दूर कर उनका जीवन सुखमय बनाती हैं। नवरात्र के पहले दिन प्रतिपदा में घटस्थापना के साथ ही मां शैलपुत्री का व्रत शुरु हो जाता है। तो जानिए, घटस्थापना मुहूर्त, मां शैलपुत्री के व्रत, पूजा विधि, कथा, मंत्र, आरती और महत्व के बारे में...

2020 चैत्र नवरात्रि घटस्थापना: तिथि और मुहूर्त

  •  घटस्थापना मुहूर्त: प्रात: 6:19 बजे से 7:17 बजे तक (बुधवार, मार्च 25, 2020)
  •  अवधि: 58 मिनट
  •  प्रतिपदा तिथि प्रारंभ: अपराह्न 2:57 बजे (मंगलवार, मार्च 24, 2020)
  • प्रतिपदा तिथि समाप्त: सायं 5:26 बजे (बुधवार, मार्च 25, 2020)

ध्यान रहे, घटस्थापना मुहूर्त की गणना सूर्योदय, सूर्यास्त और दोपहर के समय को देख कर की जाती है इसलिए सभी शहरों के लिए यह अलग-अलग हो सकता है।

 घटस्थापना विधि और महत्व

घटस्थापना नवरात्र के दौरान किए जाने वाले महत्वपूर्ण कर्मकाण्डों में से एक है। इसी से नवरात्र की शुरुआत होती है। हमारे शास्त्रों में घटस्थापना के नियम और दिशा-निर्देशों के बारे में विस्तार से बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार घटस्थापना कर नवरात्र की शुरुआत शुभ मुहूर्त देखकर ही की जानी चाहिए। घटस्थापना के साथ ही भगवती दुर्गा का आवाहन कर उन्हें पूजा के लिए आमंत्रित किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार गतल समय पर किए गए आवाहन से देवी दुर्गा को क्रोध आ सकता है। इसलिए घटस्थापना मुहूर्त का चयन बहुत महत्वपूर्ण होता है जो प्रतिपदा तिथि पर निर्धारित होता है। इसके लिए अमावस्या की तिथि और रात्रि का समय शुभ नहीं माना जाता। प्रतिपदा तिथि में दिन का पहला एक तिहाई भाग घटस्थापना के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है।

घटस्थापना को कलश स्थापना के नाम से भी जाना जाता है। इसकी संपूर्ण विधि इस प्रकार है:

  • सबसे पहले मिट्टी के एक बड़े पात्र में थोड़ी सी मिट्टी डालें और उसमें जौ के बीज डाल दें।
  • अब इस पात्र में दोबारा से मिट्टी डालें और फ़िर से बीज डाल दें। 
  • उसके बाद पूरे पात्र में मिट्टी डाल दें और ऊपर से जौ के बीच डालकर थोड़ा सा जल डालें। ध्यान रहे आपको मिट्टी में बीज इस तरह से लगाने हैं कि जौ ऊपर की ओर उगें।
  • अब इस पात्र और कलश के गले पर मौली बांधें और तिलक लगाएं।
  • उसके बाद कलश में गंगाजल भर दें। इस जल में सुपारी, इत्र, दूर्वा घास, अक्षत और सिक्का भी डाल दें।
  • अब इस कलश के किनारों पर 5 अशोक के पत्ते लगाएं और उसे ढक्कन से ढक दें।
  • फ़िर एक नारियल को लाल कपड़े या चुन्नी में लपेट लें। साथ ही इसमें कुछ पैसे भी रख लें। नारियल और चुन्नी को रक्षा सूत्र से बांध दें।
  • अब ज़मीन को अच्छी तरह साफ़ करके उस पर जौ वाला पात्र रख लें। फ़िर उस पात्र के ऊपर कलश रखें और सबसे आख़िर में कलश के ढक्कन पर लाल चुन्नी में लिपटा वह नारियल रख दें। इस तरह आपकी कलश स्थापना पूरी होती है।

कलश स्थापना के बाद सभी देवी-देवताओं का आह्वान कर नवरात्रि का पूजन किया जाता है। ध्यान रहे, आपको यह कलश नौ दिन तक मंदिर में रखना और आवश्यकतानुसार इसमें पानी डालते रहना होता है। साथ ही मंदिर में एक अखंड दीप भी जलाया जाता है जो कि नवरात्र के नौवें दिन तक जलना चाहिए।

 

मां शैलपुत्री की पूजा का महत्व

नवरात्र में पूरे नौ दिन व्रत रखकर माता की पूजा बड़े ही श्रद्धा भाव से की जाती है। जो लोग पूरे नौ दिन व्रत नहीं रख सकते वे पहले और आखिरी दिन व्रत रखकर भी माता शैलपुत्री की कृपा प्राप्त कर सकते हैं। माता शैलपुत्री का चंद्रमा पर नियंत्रण होता है। इसलिए विधि पूर्वक इनकी आराधना करने से चंद्रमा से संबंधित सभी दोष दूर हो जाते हैं। मां शैलपुत्री का जन्म पत्थर या शिला से हुआ है इसलिए इनकी पूजा करने से जीवन में स्थिरता आती हैं। मां सौभाग्य की देवी भी हैं इसलिए इनकी आराधना से आपको सौभाग्य की प्राप्ति होती है। वैवाहिक जीवन सुखमय रहता है और घर में ख़ुशहाली आती है।

इनकी पूजा में सभी तीर्थों, नदियों, समुद्रों, नवग्रहों, दिक्पाल (पुराणों के अनुसार दसों दिशाओं का पालन करने वाला देवता), दिशाओं, नगर देवता, ग्राम देवता सहित सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया जाता है। मां शैलपुत्री की पूजा करने के बाद उनकी कथा पढ़ी या सुनी जाती है। उनका स्तुतिपाठ व मंत्र का उच्चारण किया जाता है।


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 मां शैलपुत्री की व्रत कथा

एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में उन्होंने सभी देवी-देवाताओं को अपना-अपना यज्ञ-भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया लेकिन भगवान शंकर को निमंत्रण नहीं भेजा। सती ने जब सुना कि पिता एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन कर रहे हैं तो उनका मन वहां जाने के लिए व्याकुल हो उठा। उन्होंने शंकर जी से अपनी यह इच्छा ज़ाहिर की। शंकर जी ने कहा कि तुम्हारे पिता हमसे किसी कारणवश नाराज़ हैं। उन्होंने सभी देवी-देवताओं को निमंत्रित किया। यहां तक कि उन्हें उनके यज्ञ-भाग भी समर्पित किए लेकिन हमें जानबूझकर नहीं बुलाया। कोई सूचना तक न भेजी। ऐसे में तुम्हारा वहां जाना ठीक नहीं होगा। लेकिन यह सब सुनने के बाद भी सती की पिता का यज्ञ देखने, पिता और बहनों से मिलने की व्यग्रता किसी भी तरह कम न हो सकी।

सती का प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकर ने उन्हें वहां जाने की अनुमति दे दी। सती जब वहां गईं तो उन्होंने देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बात नहीं कर रहा है। केवल उनकी माता ने उन्हें स्नेहपूर्वक गले लगाया। उन्होंने वहां लोगों में भगवान शंकर जी के प्रति तिरस्कार का भाव भी देखा। बहनों ने उन पर तंज़ कसा। उनके पिता ने भगवान शंकर जी के बारे में अपशब्द कहें। सती ने जब यह सब देखा तो उनका हृहय ग्लानि और क्षोभ से भर गया। उन्होंने सोचा कि भगवान शंकर जी की बात न मानकर उन्होंने यहां आकर बहुत बड़ी गलती की। अपने पति (भगवान शंकर) के अपमान को वे सह न सकीं और ख़ुद को वहीं योगाग्नि में जलाकर भस्म कर दिया।

भगवान शंकर ने जब यह दु:खद घटना सुनी तो क्रुद्ध होकर अपने गणों को वहां भेजा और प्रजापति दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णत: विध्वंस कर दिया। सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वे शैलपुत्री के नाम से विख्यात हुईं। पार्वती, हैमवती भी इन्हीं के नाम हैं। उपनिषदों में दी गई एक अन्य कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती के स्वरूप में देवताओं का गर्व भंजन किया था।  

मां शैलपुत्री का मंत्र

ऊँ देवी शैलपुत्र्ये नम: ।।

 स्रोत पाठ

  • प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर: तारणीम्।
  • धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥
  • त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।
  • सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥
  • चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह: विनाशिन।
  • मुक्ति भुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥

 ध्यान मंत्र

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्द्वकृतशेखराम्।

वृषारूढ़ा शूलधरां यशस्विनीम्॥

 अर्थ- देवी वृषभ पर विराजित हैं। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल है और बाएं हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है। यही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। नवरात्रि के प्रथम दिन देवी उपासना के अंतर्गत शैल पुत्री का पूजन करना चाहिए।

मां शैलपुत्री की आरती

  • शैलपुत्री माँ बैल पर सवार। करें देवता जय जय कार॥
  • शिव-शंकर की प्रिय भवानी। तेरी महिमा किसी ने न जानी॥
  • पार्वती तू उमा कहलावें। जो तुझे सुमिरे सो सुख पावें॥
  • रिद्धि सिद्धि परवान करें तू। दया करें धनवान करें तू॥
  • सोमवार को शिव संग प्यारी। आरती जिसने तेरी उतारी॥
  • उसकी सगरी आस पुजा दो। सगरे दुःख तकलीफ मिटा दो॥
  • घी का सुन्दर दीप जला के। गोला गरी का भोग लगा के॥
  • श्रद्धा भाव से मन्त्र जपायें। प्रेम सहित फिर शीश झुकायें॥
  • जय गिरराज किशोरी अम्बे। शिव मुख चन्द्र चकोरी अम्बे॥
  • मनोकामना पूर्ण कर दो। चमन सदा सुख सम्पत्ति भर दो॥  

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