गण्डान्त दोष क्या है, और गंड मूल नक्षत्रों की शांति के उपाय

Indian Astrology | 07-Apr-2020

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गण्डमूल को शास्त्रों में गण्डान्त की संज्ञा दी गई है। यह एक संस्कृत भाषा का शब्द है गण्ड का अर्थ होता है निकृष्ट,| तिथि लग्न नक्षत्र का कुछ भाग गण्डान्त कहलाता है। ज्योतिष शास्त्र में सत्ताईस नक्षत्रों का उल्लेख किया गया हैइन नक्षत्रों में से कुछ नक्षत्र काफी शुभ होते हैं वहीं कुछ नक्षत्र ऐसे भी होते हैं जिन्हें गंडमूल नक्षत्र अर्थात अशुभ नक्षत्रों की श्रेणी में रखा जाता है, यह दोष कुंडली धारक के जीवन में तरह-तरह की परेशानियां तथा अड़चनें पैदा करता है, किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में चन्द्रमा, रेवती, अश्विनी, श्लेषा, मघा, ज्येष्ठा तथा मूल नक्षत्रों में से किसी एक नक्षत्र में स्थित हो तो व्यक्ति का जन्म गंड मूल में हुआ माना जाता है अर्थात उसकी कुंडली में गंड मूल दोष की उपस्थिति मानी जाती है, इन नक्षत्र चरणों में यदि किसी जातक का जन्म हुआ हो तो, जन्म से 27वें दिन में जब पुनः वही नक्षत्र जाता है तब विधि विधान पूर्वक पूजन एवं हवनादि के माध्यम से इनकी शान्ति कराई जाती है। इन ; अशुभ नक्षत्रों में से भी मूल नक्षत्र को सबसे अधिक अशुभ माना जाता है, जो भी व्यक्ति इस नक्षत्र में जन्म लेता है उसका पूरा जीवन बाधाओं और परेशानियों से घिरा रहता है, इस दोष को गंड मूल दोष कहा जाता है, अशुभ नक्षत्रों की श्रेणी में अश्वनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती शामिल हैं, सभी नक्षत्रों के चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरणों के अनुसार जातक के माता, पिता, भाई, बहन या परिवार के किसी अन्य सदस्य पर अपना प्रभाव दर्शाने लगते हैं, अशुभ नक्षत्र अपना बुरा प्रभाव दिखाते हैं वहीँ शुभ नक्षत्र अपना शुभ प्रभाव दिखाते हैं, गण्डान्त दोष चन्द्रमा के इन छः नक्षत्रों के किसी एक नक्षत्र के किसी एक विशेष चरण में होने से ही बनता है, कि उस नक्षत्र के चारों में से किसी भी चरण में स्थित होने से, किसी भी जातक की कुंडली का गहन अध्ययन करने के बाद ही यह पता लगाया जा सकता है कि दोष कौन सा है, इसके बाद ही उपाय के लिए सोचा जा सकता है,

नक्षत्र गण्डान्त-

इसी प्रकार रेवती और अश्विनी की संधि पर, आश्लेषा और मघा की संधि पर और ज्येष्ठा और मूल की संधि पर नक्षत्र गंडांत होता है। रेवती, ज्येष्ठा अश्लेषा नक्षत्र की अन्त की दो दो घडि़यां अर्थात 48 मिनट, अश्विनी, मघा मूल नक्षत्र के प्रारम्भ की दो दो घडि़यां, नक्षत्र गण्डान्त कहलाती है।

तिथि गन्डान्त-

पूर्णातिथि (5, 10, 15) के अंत की दो घटी, नंदा तिथि (1, 6, 11) के आदि में दो घटी कुल मिलाकर छः तिथि को गंडांत कहा गया है। प्रतिपदा, षष्ठी एकादशी तिथि की प्रारम्भ की एक घटी अर्थात प्रारम्भिक 24 मिनट एवं पूर्णिमा, पंचमी दशमी तिथि की अन्त की एक घटी, तिथि पूर्ण गन्डान्त अर्थात अधिक दोष युक्त होती है।


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लग्न गण्डान्त-

मीन लग्न के अन्त की आधी घटी, कर्क लग्न के अंत सिंह लग्न के प्रारम्भ की आधी घटी, वृश्चिक लग्न के अन्त एवं धनु लग्न की आधी-आधी घटी, लग्न गण्डान्त कहलाती है। अर्थात मीन-मेष, कर्क-सिंह तथा वृश्चिक-धनु राशियों की संधियों को गंडांत कहा जाता है। मीन की आखिरी आधी घटी और मेष की प्रारंभिक आधी घटी, कर्क की आखिरी आधी घटी और सिंह की प्रारंभिक आधी घटी, वृश्चिक की आखिरी आधी घटी तथा धनु की प्रारंभिक आधी घटी लग्न गंडांत कहलाती है। इन गंडांतों में ज्येष्ठा के अंत में 5 घटी और मूल के आरंभ में 8 घटी महाअशुभ मानी गई है। यदि किसी जातक का जन्म उक्त योग में हुआ है तो उसे इसके उपाय करने चाहिए।

अश्विनी नक्षत्र के पहले चरण में जन्म लेने वाले व्यक्ति के पिता का जीवन अत्याधिक कष्टप्रद होता है, इसके अलावा इस दोष का सारा नकारात्मक प्रभाव जातक के पिता पर ही पड़ता है,

आश्लेषा नक्षत्र के पहले चरण में जन्म हो तो शुभ ,दूसरे में धन हानि ,तीसरे में माता को कष्ट तथा चौथे में पिता को कष्ट होता है,

मघा नक्षत्र के पहले चरण में जन्म हो तो माता के पक्ष को हानि, दूसरे में पिता को कष्ट तथा अन्य चरणों में शुभ होता है,

ज्येष्ठ नक्षत्र और मंगलवार के योग में जन्म लेने वाली कन्या अपने भाई के लिए घातक साबित होती है, तीसरे चरण में माता-पिता एवं चौथे चरण में स्वयं को अरिष्ट होता है|

मूल नक्षत्र के पहले चरण में जन्म लेने वाले व्यक्ति के पिता को जीवनभर कष्ट मिलता है, दूसरे चरण में जन्म लेने वाले व्यक्ति की माता, तीसरे में धन की हानि होती है, जबकि चौथा चरण शुभ माना गया है,

रेवती नक्षत्र में पहला और दूसरा चरण शुभ होता है, तीसरा चौथा चरण  माता पिता के लिए  कष्टदायक होता है,


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गंड मूल नक्षत्रों की शांति के उपाय-

गंडांत दोष में जन्म लेने वाले बालक के पिता उसका मुंह तभी देखें जब इस दोष की शांति हो गई हो। इस दोष  की शांति हेतु किसी पंडित से जानकर उपाय करें। गंडांत दोष को संतान जन्म के लिए अशुभ समय कहा गया है। इस योग में संतान जन्म लेती है तो गण्डान्त शान्ति कराने के बाद ही पिता को शिशु का मुख देखना चाहिए। पराशर मुनि के अनुसार तिथि गण्ड में बैल का दान, नक्षत्र गण्ड में गाय का दान और लग्न गण्ड में स्वर्ण का दान करने से दोष मिटता है। संतान का जन्म अगर गण्डान्त पूर्व में हुआ है तो पिता और शिशु का अभिषेक करने से और गण्डान्त के अंतिम भाग में जन्म लेने पर माता एवं शिशु का अभिषेक कराने से दोष कट जाता है।

  • ज्येष्ठा गंड शांति में इन्द्र सूक्त और महामृत्युंजय का पाठ किया जाता है। मूल, ज्येष्ठा, आश्लेषा और मघा को अति कठिन मानते हुए 3 गायों का दान बताया गया है। रेवती और अश्विनी में 2 गायों का दान और अन्य गंड नक्षत्रों के दोष या किसी अन्य दुष्ट दोष में भी एक गाय का दान बताया गया है।
  • जन्म के नक्षत्रों के अनुसार संबंधित देवता की पूजा करने से नक्षत्रों के नकारात्मक प्रभाव में कमी आती है|
  • अश्विनी, मघा, मूल नक्षत्र में जन्में जातकों को गणेश जी की अराधना करनी चाहिए। इसके अलावा माह के किसी भी एक बुधवार या गुरुवार को हरे रंग का वस्त्र या लहसूनिया, किसी भी एक वस्तु का दान करना चाहिए, इसके अलावा मंदिर में झंडा फहरना भी लाभदायक सिद्ध होगा|
  • आश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती नक्षत्र में जन्में जातकों के लिए बुध ग्रह की अराधना करना फलदायी साबित होती है, इन नक्षत्रों में से किसी भी एक नक्षत्र में जन्में व्यक्ति को बुधवार के दिन हरा धनिया, हरी सब्जी, पन्ना या कांसे के बर्तन का दान करना चाहिए|
  • गंडमूल में जन्में बच्चे के जन्म के ठीक 27वें दिन गंडमूल शांति पूजा करवाई जानी चाहिए, इसके अलावा ब्राह्मणों को दान, दक्षिणा देने और उन्हें भोजन करवाना चाहिए|
  • पाराशर होरा ग्रंथ शास्त्रकारों ने ग्रहों की शांति को विशेष महत्व दिया है। फलदीपिका के रचनाकार मंत्रेश्वरजी ने एक स्थान पर लिखा है कि-

दशापहाराष्टक वर्गगोचरे, ग्रहेषु नृणां विषमस्थितेष्वपि।

जपेच्चा तत्प्रीतिकरै: सुकर्मभि:, करोति शान्तिं व्रतदानवन्दनै:।।

अर्थात जब कोई ग्रह अशुभ गोचर करे या अनिष्ट ग्रह की महादशा या अंतरदशा हो तो उस ग्रह को प्रसन्न करने के लिए व्रत, दान, वंदना, जप, शांति आदि द्वारा उसके अशुभ फल का निवारण करना चाहिए।


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