ऐसे करें मां सरस्वती की आराधना, जानिए, राशि अनुसार पूजा विधि, पढ़ें व्रत कथा...

Indian Astrology | 28-Jan-2020

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माघ महीने को हिंदू धर्मग्रंथों में बेहद शुभ माना गया है। चौथ, तीज, मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या, हिंदू धर्म के आदि कई त्योहार इसी महीने में मनाए जाते हैं। माघ स्नान (Magh Snan 2020) की शुरुआत भी इसी महीने से होती है और बसंत की शुरुआत भी!

बसंत के पहले दिन को बसंत पंचमी (Vasant Panchami) के त्योहार के रूप में मनाया जाता है। इसे वर्ष का सबसे शुभ दिन माना जाता है। इसलिए किसी भी बड़े काम की शुरुआत के लिए यह सबसे उत्तम दिन है। संगीतकारों, लेखकों, कलाकारों, शिक्षकों, विद्यार्थियों व अध्ययन के किसी अन्य क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए इस दिन का विशेष महत्व है। इस दिन श्रीगणेश के साथ देवी सरस्वती की पूजा का विधान है। मान्यता है कि इस दिन देवी सरस्वती की आराधना करने से बुद्धि, ज्ञान, यश और धन की प्राप्ति होती है। आइए, जानते हैं इस त्योहार के शुभ मुहूर्त, राशि अनुसार पूजा विधि और महत्व के बारे में...

बसंत पंचमी 2020: तिथि व शुभ मुहूर्त

  • पंचमी तिथि प्रारंभ: सुबह 8:15 बजे (29 जनवरी, 2020)
  • पंचमी तिथि समाप्त: सुबह 10:49 बजे (30 जनवरी, 2020)
  • बसंत पंचमी मध्याह्न क्षण: दोपहर 12:42 बजे
  • बसंत पंचमी सरस्वती पूजा मुहूर्त: सुबह 8:15 बजे से दोपहर के 12:42 बजे तक
  • पूजा की कुल अवधि: 4 घंटे 27 मिनट

पौराणिक संदर्भ

बसंत पंचमी का उल्लेख हमें विभिन्न ग्रंथों में अलग-अलग नामों से मिलता है। इसे हिंदी और संस्कृत में वसंत पंचमी (Vasant Panchami) और बसंत पंचमी (Basant Panchami) दोनों सरह से लिखा जाता है। इसके अलावा वेदों, पुराणों और महाकाव्यों में इसका उल्लेख श्री पंचमी (Shree Panchami) के नाम से भी मिलता है। कहा जाता है कि प्राचीन भारत और नेपाल में इस दिन एक बड़े उत्सव का आयोजन किया जाता था, जो बसंत या वंसत पंचमी कहलाता था। उपनिषदों और पुराणों में दी गई कथा के अनुसार इस दिन विद्या और वाणी की देवी मां सरस्वती का जन्म हुआ था। इसके अलावा इसे विश्व की कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं और किरदारों से जोड़ कर भी देखा जाता है। महाकाव्यों में सभी 6 ऋतुओं में वसंत का वर्णन प्रमुखता से मिलता है। इसे उल्लास, सौंदर्य और प्रेम के मौसम के रूप भी वर्णित किया गया है।

बसंत पंचमी का धार्मिक महत्व

“जब मैं बच्चा होकर अपने धर्म का पालन कर रहा हूं, तो तुम बड़े होकर अपने धर्म से विमुख क्यों हो रहे हो...”

ये वीर हकीकत के आखिरी शब्द थे जब अपने धर्म का पालन करने के नाते तलवार से उसकी गर्दन को कलम कर दिया गया था। यह कोई और नहीं, वसंत पंचमी (1734) का दिन था।

वीर हकीकत को इतिहास में एक साहसी बच्चे के रूप जाना जाता है जिसने जबरन अपना धर्म परिवर्तन करने की बजाए मृत्युदंड स्वीकार किया। वीर हकीकत लाहौर निवासी था। वह मुस्लिम बच्चों के साथ पढ़ने के लिए मदरसे में जाता था। एक बार मुस्लिम बच्चों ने उसके सामने दुर्गा मां की हंसी उड़ाई। तब हकीकत ने कहा कि अगर मैं तुम्हारी बीबी फातिमा का मज़ाक उड़ाऊं तो तुम्हे कैसा लगेगा? फिर क्या था, मुस्लिम बच्चों ने हकीकत की शिकायत शिक्षक से कर दी। यह बात इतनी बढ़ी कि काज़ी तक पहुंच गई। हकीकत को कहा गया कि या तो वह मुस्लिम बन जाए या मृत्युदंड स्वीकार कर ले। हकीकत ने अपने धर्म का पालन करते हुए मृत्युदंड स्वीकार किया।

कहा जाता है कि उस नन्हे बालक को देखकर जल्लाद का दिल भी मोम हो गया था। उसके हाथ कांपने लगे थे। उसकी तलवार बच्चे हकीकत की गर्दन पर नहीं पहुंच रही थी। तब हकीकत ने उसे अपने धर्म का पालन करते हुए तलवार चलाने को कहा था।

जल्लाद ने बच्चे की गर्दन पर तलवार चला दी पर उसका शीश धरती पर गिरने की बजाए आकाशमार्ग से स्वर्ग में पहुंच गया। आज भी पाकिस्तान में (विशेषकर लाहौर में) वीर हकीकत की याद में बसंत पंचमी का त्योहार मनाया जाता है और आकाश में पतंगे उड़ाई जाती हैं।

इसके अलावा इस दिन को सिखों के कूका पंथ के संस्थापक रामसिंह कूका के जन्मदिवस के रूप में भी मनाया जाता है। रामसिंह कूका का जन्म 1816 में बसंत पंचमी के अवसर पर हुआ था। उन्होंने कुछ वक्त तक पंजाब के राजा रणजीत सिंह की सेना में काम किया। उसके बाद वे खेती-बाड़ी करने लगे लेकिन आध्यात्मिक प्रवृत्ति का होने के कारण दूर-दूर से लोग उनके उपदेश सुनने आते थे। धीरे-धीरे उनके अनुयायियों का एक पंथ ही बन गया जिसे कूका पंथ कहा गया।

बसंत पंचमी का संबंध रामकथा से भी है। मान्यता है कि रावण द्वारा सीता हरण के बाद राम उन्हें खोजने दक्षिण की ओर बढ़े। यहां सीता की खोज में वे दंडकारण्य (आधुनिक छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और ओडिसा में स्थित) नामक स्थान पर भी गएं। यहां शबरी नाम की एक भीलनी (मध्य और दक्षिण भारत की एक जनजाति) रहती थी। राम जब उसकी कुटिया में प्रवेश करते हैं तो भीलनी उन्हें प्रेम पूर्वक मीठे-मीठे बेर चखकर खिलाती है। कहा जाता है कि यह घटना बसंत पंचमी के दिन घटी थी। आज भी वहां के निवासी एक शिला की पूजा करते हैं जिसके बारे में मान्यता है कि भगवान राम जब शबरी से मिले तो इसी शिला पर बैठे थे। इसके अलावा वहां भील देवी का मंदिर भी है।

बसंत पंचमी का ऐतिहासिक महत्व

बसंत पंचमी इतिहास की कई महत्वपूर्ण घटनाओं की भी याद दिलाता है। बसंत पंचमी के दिन ही पृथ्वीराज चौहान वीरगति को प्राप्त हुए थे। चंदबरदाई द्वारा लिखित पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज ने मोहम्मद गौरी को 16 बार पराजित किया था और हर बार उदारता दिखाते हुए ज़िंदा छोड़ दिया था। लेकिन 17वीं बार युद्ध होने पर वे पराजित हो जाते हैं। मोहम्मह गौरी उन्हें कैद कर अफ़गानिस्तान ले जाता है और उनकी आंखें फोड़कर उन्हें दृष्टिहीन बना देता है। लेकिन मृत्युदंड से पूर्व उसने पृथ्वीराज रासो के शब्दभेदी बाण का कमाल देखना चाहा। पृथ्वीराज के कवि चंदबरदाई के कहने पर वह एक ऊंचे स्थान पर बैठ गया और तवे पर चोट कर बाण छोड़ने का आदेश दिया। तभी चंदबरदाई निम्न पंक्तियां बोलकर पृथ्वीराज को गौरी के स्थान का संकेत देते हैं:

चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण।
ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान ॥

पृथ्वीराज चौहान इस बार नहीं चूकते। तवे की चोट और चंदबरदाई के संकेत से उन्होंने जो बाण छोड़ा वह मोहम्मद गौरी के सीने में जा धंसा। तब गौरी और पृथ्वीराज ने एक दूसरे के पेट में छुरा मारकर आत्म बलिदान दिया। पारंपरिक कथाओं के अनुसार 1192 सीई की यह घटना बसंत पंचमी के दिन घटी थी।

परमार या पंवार वंश के नौवे राजा, राजा भोज का जन्म भी वसंत पंचमी के दिन हुआ था। राजा भोज को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल को बसाने का श्रेय दिया जाता है। वसंत पंचमी के दिन राजा भोज एक बड़े उत्सव का आयोजन करते थे जिसमें पूरी प्रजा के लिए प्रतिभोज रखा जाता था जो कि 40 दिन तक चलता था।

बसंत पंचमी 2020: राशि अनुसार सरस्वती पूजा विधि और उपाय

बसंत पंचमी के दिन को बुद्धि, ज्ञान, विद्या और वाणी की देवी, मां सरस्वती के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन सरस्वती पूजा (Saraswati Puja) करने से मां सरस्वती प्रसन्न होती हैं और आप पर उनकी कृपा बनी रहती है। जड़ता और अज्ञानता को दूर कर वे आपको प्रगति की ओर अग्रसर करती हैं।

स्कंदपुराण के अनुसार इस दिन मां सरस्वती को सफेद पुष्प, चंदन, श्वेत वस्त्रादि अर्पित कर उनकी पूजा की जाती है। इस दिन उन्हें खीर और केसरिया भात का भोग लगाना चाहिए और ऊँ श्री सरस्वतयै नम: मंत्र का 108 बार जाप करना चाहिए। इसके अलावा मां सरस्वती की स्तुति करने के लिए इस दिन सरस्वती या कुंदेंदु का पाठ किया जाता है।

मां सरस्वती के साथ संगीतकारों को अपने वाद्य यंत्रों और लेखकों, विद्यार्थियों व अध्ययन के क्षेत्र से जुड़े अन्य लोगों को कॉपी, किताब व कलम समेत अपनी समस्त वस्तुओं की भी पूजा करनी चाहिए और मां सरस्वती को मोर पंख अर्पित करना चाहिए। सरस्वती यंत्र (Saraswati Yantra) और पुखराज (Pukhraj) धारण करने के लिए यह सबसे उत्तम दिन है।

इसके अलावा राशि अनुसार निम्न उपाय भी करें:

  • मेष (Aries): मां सरस्वती को लाल पुष्प और सफेद तिल अर्पित करें और सरस्वती कवच का पाठ करें। ऐसा करने से विद्या और बुद्धि की प्राप्ति होगी।
  • वृषभ (Taurus): सरस्वती मां की पूजा में नीली स्याही का प्रयोग करें। मां सरस्वती को पीले रंग के चावल का भोग लगाएं। इससे अपकी एकाग्र शक्ति में वृद्धि होगी।
  • मिथुन (Gemini): देवी सरस्वती की पूजा करने के बाद गायत्री मंत्र का जाप करें। मां सरस्वती को पुस्तकें अर्पित करें और बाद में उन पुस्तकों को किसी गरीब को दान करें। इससे आपको पुण्य फलों की प्राप्ति होगी।
  • कर्क (Cancer): मां सरस्वती को चंदन और सफेद फूल अर्पित करें। इससे भ्रम की स्थिति उत्पन्न नहीं होगी और आप सही फैसले ले पाएंगे।
  • सिंह (Leo): मां सरस्वती को कनेर के फूल और धान अर्पित करें और खीर और पीले रंग की किसी मिठाई का भोग लगाएं। इससे आपकी शिक्षा में आ रहीं विभिन्न बाधाएं दूर होंगी और आपको मनमाफिक फल मिलेंगे।
  • कन्या (Virgo): मां सरस्वती को कलम और दवात के साथ सफेद फूल अर्पित करें और सरस्वती मंत्र का जाप करें। इससे आपका मन विचलित नहीं रहेगा और आप सही फैसले ले पाएंगे।
  • तुला (Libra): मां सरस्वती को सफेद चंदन का तिलक लगाएं। यह तिलक अपने माथे पर भी लगाएं। ऐसा करने से आप पर माता की विशेष कृपा बनी रहेगी।
  • वृश्चिक (Scorpio): सरस्वती मंत्र का जाप करें और किसी ज़रूरतमंद बच्चे को लिखने और पढ़ने की वस्तुएं दान करें। ऐसा करने से आपकी बुद्धि का विकास होगा।
  • धनु (Sagittarius): माता सरस्वती के साथ भगवान गणेश की भी पूजा करें। इसके अलावा मां सरस्वती की पूजा करते वक्त उन्हें रोली और नारियल ज़रूर अर्पित करें। ऐसा करने से आपके ज्ञान में वृद्धि होगी।
  • मकर (Capricorn): मां सरस्वती की पूजा करने के बाद 5 कन्याओं को पीले वस्त्र आदि ज़रूरत की चीज़ें भेंट करें। ऐसा करने से आपको हर ओर से सफलता मिलेगी लेकिन उसके लिए आपको मेहनत करनी होगी।
  • कुंभ (Aquarious): ज़रूरतमंद और गरीबों को अनाज दान करें। ऐसा करने से आपके आस-पास की नकारात्मक ऊर्जा दूर होगी और सफलता प्राप्ति के लिए आपको अनेक अवसर मिलेंगे।
  • मीन (Pisces): सफेद चंदन की माला (White Chandan Mala) के साथ सरस्वती मंत्र का 108 बार जाप करें। शास्त्रों के अनुसार ऐसा करने से बुद्धि और विद्या की प्राप्ति होती है।

राशि अनुसार सरस्वती मंत्र

देवी सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए राशि अनुसार सरस्वती मंत्र का जाप करें:

  • मेष (Aries)- ॐ वाग्देवी वागीश्वरी नम:
  • वृषभ (Taurus)- ॐ कौमुदी ज्ञानदायनी नम:
  • मिथुन (Gemini)- ॐ मां भुवनेश्वरी सरस्वत्यै नम:
  • कर्क (Cancer)- ॐ मां चन्द्रिका दैव्यै नम:
  • सिंह (Leo)- ॐ मां कमलहास विकासिनी नम:
  • कन्या (Virgo)- ॐ मां प्रणवनाद विकासिनी नम:
  • तुला (Libra)- ॐ मां हंससुवाहिनी नम:
  • वृश्चिक (Scorpio)- ॐ शारदै दैव्यै चंद्रकांति नम:
  • धनु (Sagittarius)- ॐ जगती वीणावादिनी नम:
  • मकर (Capricorn)- ॐ बुद्धिदात्री सुधामूर्ति नम:
  • कुंभ (Aquarious)- ॐ ज्ञानप्रकाशिनी ब्रह्मचारिणी नम:
  • मीन (Pisces)- ॐ वरदायिनी मां भारती नम:

सरस्वती वंदना

इस दिन देवी सरस्वती की वंदना करने का विशेष महत्व है। इसके लिए आप इस दिन मां सरस्वती की सबसे प्रचलित स्तुति सरस्वती या कुंदेंदु का पाठ कर सकते हैं...

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना॥
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥१॥

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं।
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌॥
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌।
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥२॥

वसंत पंचमी कथा 2020: कैसे हुआ देवी सरस्वती का जन्म?

पुराणों एवं उपनिषदों में देवी सरस्वती के जन्म को लेकर अलग-अलग कथाएं मिलती है। कुछ कथाओं के अनुसार देवी सरस्वती का जन्म ब्रह्मा के मुख से हुआ था। जबकि कुछ अन्य कथाओं के अनुसार देवी सरस्वती मां दुर्गा का ही दूसरा रूप हैं।

उपनिषदों में दी गई कथा के अनुसार भगवान शिव की आज्ञा पर ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की। लेकिन वे अपनी सर्जना से संतुष्ट नहीं थी। उन्हें हर तरफ़ उदासी और मौन नज़र आया। तब उन्होंने अपने कमण्डल से जल का छिड़काव कर भगवान विष्णु की स्तुति की। भगवान विष्णु प्रकट हुए और सब सुनने के बाद उन्होंने देवी दुर्गा का आह्वान किया। देवी दुर्गा के प्रकट होने पर भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी ने उनसे इस समस्या का समाधान करने को कहा। तभी देवी दुर्गा के शरीर से श्वेत रंग का तेज प्रकट हुआ और वे श्वेत वस्त्र धारण किए हुए एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री में बदल गईं।

इस स्त्री के चारों हाथों में से एक में वीणा थी और दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक और माला थी। इसे देवताओं ने वाणी और विद्या की देवी सरस्वती कहा। मां सरस्वती ने जैसे ही वीणा बजाई संसार के समस्त जीवों को वाणी मिली और इस तरह चारों ओर छाई उदासी दूर हुई।

देवी सरस्वती को विभिन्न ग्रंथों में अलग-अलग नाम से संबोधित किया गया है। उन्हें भगवती शारदा, वीणा वादिनी, वाग्देवी (ज्ञान की देवी), बागेश्वरी आदि नामों से संबोधित किया गया है।

इस पर्व को और खास बनाने के लिए भारत के सर्वश्रेष्ठ ज्योतिषी से गाइडेंस लें।