नवरात्र का छठा दिन: मनचाहे वर के लिए ऐसे करें मां कात्ययनी की पूजा, जानिए, सही मंत्र, आरती और महत्व

Indian Astrology | 30-Mar-2020

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नवरात्र का छठा दिन मां दुर्गा की षष्ठी शक्ति माता कात्यायनी को समर्पित है। देवी का यह स्वरूप करुणामयी है। देवी पुराण के अनुसार कात्यायन ऋषि के घर उन्होंने पुत्री के रूप में जन्म लिया था इसीलिए उन्हें देवी कात्यायनी के रूप में जाना जाता है। परंपरागत रूप से वे देवी दुर्गा की तरह लाल रंग से जुड़ी हुई हैं। मां कात्यायनी सभी देवियों में सर्वाधिक सुंदर हैं। नवरात्र की षष्ठी को कन्याएं मां कात्यायनी की विशेष पूजा करती हैं जिससे उनके विवाह में आ रहीं अड़चनें दूर हों और उन्हें मनचाहा वर प्राप्त हो।   

इस दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित होता है। योगसाधना में इस चक्र का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। इस चक्र में स्थित मन वाला साधक मां की भक्ति में लीन हो जाता है। उसमें त्याग और समर्पण की भावना आती है। आत्म त्याग की इस भावना से भक्तों को मां का आशीर्वाद प्राप्त होता है और उनके सभी कष्ट दूर होते हैं। तो आइए, आपको बताते हैं, मां दुर्गा के कात्यायनी स्वरूप की पूजा विधि, मंत्र, कथा, आरती, पौराणिक व धार्मक महत्व के बारे में..

पौराणिक संदर्भ

अमर कोष में कात्यायनी, पार्वती का ही दूसरा नाम है। यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक में इनका प्रथम उल्लेख मिलता है। स्कंदपुराण में उल्लेख है कि वे परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से उत्पन्न हुई थीं। इसके अलावा इनका उल्लेख पतंजलि के महाभाष्य, देवी भागवत पुराण, मार्कंडेय पुराण के देवी महात्म्य, बौद्ध और जैन ग्रंथों समेत कई तांत्रिक ग्रंथों, विशेष रूप से कलिका पुराण में मिलता है। कलिका पुराण (10वीं शताब्दी) में उद्यान या उड़ीसा में देवी कात्यायनी और भगवान जगन्नाथ के स्थान का उल्लेख किया गया है।

बेहद अद्भुत है मां कात्यायनी का स्वरूप

मां कात्यायनी का स्वरूप बेहद अद्भुत है। उनका स्वरूप सोने की तरह चमकीला है। देवी कात्यायनी की चार भुजाएं हैं। दायीं ओर की ऊपर वाली भुजा अभय मुद्रा में जबकि नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में है। बायीं ओर के ऊपर वाले हाथ में तलवार है जबकि नीचे वाले हाथ में वे कमल का फूल पकड़े हुए हैं। मां कात्यायनी सिंह पर सवार हैं।

मां कात्यायनी की पूजा का महत्व

मां कात्यायनी की विधिवत पूजा करने से सुखद वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद प्राप्त होता है। जिनके विवाह में विलंब हो रहा हो या जिनके वैवाहिक जीवन में समस्याएं हों उन्हें मां को हल्दी की गाठ चढ़ानी चाहिए। मां दुर्गा के इस रूप की उपासना करने से राहु और कालसर्प दोष से भी मुक्ति मिलती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार मां कात्यायनी का गुरु ग्रह पर नियंत्रण होता है इसलिए इनकी पूजा करने से गुरु ग्रह से संबंधित दोष भी दूर होते हैं। देवी की उपासना से कार्यक्षेत्र में साधक सफल होता है। उसकी तरक्की के रास्ते में आने वाली सभी बाधाएँ दूर होती हैं। ऐसा माना जाता है कि मां कात्यायनी की आराधना से कफ़, पित्त, कंठ, त्वचा, मस्तिष्क, संक्रमण अस्थि आदि से जुड़ी बीमारियों से मुक्ति मिलती है।

मां कात्यायनी की पूजा से मिलता है मनचाहा वर

नवरात्र की षष्ठी तिथि विवाह योग्य कन्याओं के लिए विशेष पूजन तथा मनोकामना पूर्ति का दिन होती है। इस दिन मां कात्यायनी की पूरे विधि-विधान से आराधना करने से कन्याओं को मनचाहा वर मिलता है। उनके विवाह में आ रहीं अड़चनें दूर होती हैं और जल्दी विवाह के योग बनते हैं। मान्यता है कि यदि कोई कन्या षष्ठी पूजन को पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से कर ले तो उसका विवाह एक वर्ष के भीतर ही हो जाता है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान कृष्ण जैसा पति पाने के लिए गोपियों ने भी मां कात्यायनी की पूजा की थी। यह पूजा कालिंदी यमुना के तट पर की गई थी। इसलिए इन्हें ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में भी जाना जाता है। इनका स्वरूप अत्यंत भव्य एवं दिव्य है। स्वर्ण के समान रंग वाली मां कात्यायनी सभी देवियों में सर्वाधिक सुंदर हैं। मनचाहा वर पाने के लिए कन्याएं षष्ठी के दिन यदि गोपियों द्वारा पढ़े गए इस मंत्र का जाप करें तो उनके लिए फलदायी होगा:

कात्यायनी, महामाया महायोगीन्यधीश्वरी

नंद गोप सुतं देवी पति में कुरुते नम:।।

ऐसे करें मां कात्यायनी की पूजा

मां कात्यायनी की पूजा विशेष प्रकार से करनी चाहिए। इसके लिए प्रात: जल्दी उठकर नहाने के पानी में गंगाजल की कुछ बूंदें डालकर स्नान करें। उसके बाद मां को प्रणाम कर व्रत करने का संकल्प लें। मां की पूजा में नारियल, कलश, गंगाजल, कलावा, रोली, चावल, चुन्नी, शहद, अगरबत्ती, धूप, दीया और घी का प्रयोग करना चाहिए। देवी को फूल और जायफल प्रिय हैं इसलिए पूजा करते समय उन्हें पुष्प और जायफल ज़रूर अर्पित करें। मां को प्रसन्न करने के लिए 3 से 4 पुष्प लेकर मां कात्यायनी के मंत्र का 108 बार जाप करना फलदायी होता है। मां कात्यायनी को रोली, हल्दी, सिंदूर लगाना चाहिए। इसके बाद मां के आगे घी का दीपक जलाना चाहिए। षष्ठी तिथि के दिन मां की पूजा में शदह का महत्व होता है इसलिए प्रसाद में शदह का प्रयोग ज़रूर करना चाहिए। माना जाता है कि इसके प्रभाव से साधक को सुंदर रूप प्राप्त होता है।


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दुर्गा सप्तशती पाठ का महत्व

नवरात्र के दिनों में दुर्गा सप्तशती का पाठ करवाने का विशेष महत्व होता है। इसके अलावा भी साल भर दुर्गा सप्तशती के पाठ से आप मां की कृपा प्राप्त कर सकते हैं। विद्वानों के अनुसार सप्ताह के हर दिन इसके पाठ का अपना अलग महत्व है और वार के अनुसार इसका पाठ विभिन्न फल देने वाला होता है। यह पाठ कराने से आपको निम्न लाभ होते हैं:

  • इस पाठ को कराने से आपको मां दुर्गा के सभी नौ रूपों की कृपा प्राप्त होती है। उनके आशीर्वाद से आपके सभी कार्य सफल होते हैं।
  • इसमें जीवन की प्रत्येक समस्या के लिए अलग मंत्र होता है जिसके उच्चारण से आपको उस समस्या का सामना करने की शक्ति मिलती है।
  • इसमें सामूहिक कल्याण, विश्व की रक्षा, महामारी-नाश, विपत्ति-नाश, भय-नाश, पाप-नाश, शक्ति प्राप्ति आदि मंत्रों का जाप किया जाता है। 
  •  दुर्गा सप्तशती के पाठ से आपकी वित्तीय, स्वास्थ्य, तनाव, विवाह, संतान और अन्य समस्याएं दूर होती हैं।

मां कात्यायनी की व्रत कथा

देवी कात्यायनी की उत्पत्ति और नाम से जुड़ी एक कथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार, एक कत नाम के ऋषि थे। इनके पुत्र का नाम कात्य था। उनके प्रसिद्ध कात्य गोत्र से ऋषि कात्यायन का जन्म हुआ था। देवी कात्यायनी का जन्म देवताओं और ऋषियों के कल्याण के लिए हुआ था। महर्षि कात्यायन के आश्रम में उन्होंने पुत्री के रूप में जन्म लिया था। महर्षि कात्यायन के घर पर ही उनका लालन-पालन हुआ था इसीलिए उन्हें देवी कात्यायनी के नाम से जाना गया।

जिस समय संसार में महिषासुर का अत्याचार बहुत बढ़ गया था तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश के तेज और प्रताप के अंश से देवी कात्यायनी का जन्म हुआ था। ऋषि कात्यायन ने दुर्गा मां की कठिन तपस्या और पूजा-अर्चना की थी और उनसे अपने घर पुत्री के रूप में जन्म लेने की इच्छा प्रकट की थी। देवी ने उनकी यह इच्छा पूरी करते हुए उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। अश्विन कृष्ण चतुर्दशी को देवी रूपी कन्या के जन्म के बाद शुक्ल सप्तमी, अष्टमी और नवमी, तीनों दिनों तक कात्यायन ऋषि ने इनकी पूजा की थी। फ़िर दशमी तिथि को देवी ने महिषासुर का वध किया और देवों को उसके अत्याचार से मुक्ति दिलाई।

मंत्र

ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥

 प्रार्थना

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।

कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥

स्तुति

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

अर्थ: हे मां! सर्वत्र विराजमान और शक्ति-रूपिणी प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता/करती हूं।

ध्यान

  • वन्दे वाञ्छित मनोरथार्थ चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
  • सिंहारूढा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्विनीम्॥
  • स्वर्णवर्णा आज्ञाचक्र स्थिताम् षष्ठम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
  • वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
  • पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालङ्कार भूषिताम्।
  • मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
  • प्रसन्नवदना पल्लवाधरां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।
  • कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम्॥

स्तोत्र पाठ

कञ्चनाभां वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।

स्मेरमुखी शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोऽस्तुते॥

पटाम्बर परिधानां नानालङ्कार भूषिताम्।

सिंहस्थिताम् पद्महस्तां कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥

परमानन्दमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।

परमशक्ति, परमभक्ति, कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥

विश्वकर्ती, विश्वभर्ती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।

विश्वाचिन्ता, विश्वातीता कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥

कां बीजा, कां जपानन्दकां बीज जप तोषिते।

कां कां बीज जपदासक्ताकां कां सन्तुता॥

कांकारहर्षिणीकां धनदाधनमासना।

कां बीज जपकारिणीकां बीज तप मानसा॥

कां कारिणी कां मन्त्रपूजिताकां बीज धारिणी।

कां कीं कूंकै क: ठ: छ: स्वाहारूपिणी॥

मां कात्यायनी की आरती

जय जय अम्बे जय कात्यायनी। जय जग माता जग की महारानी॥

बैजनाथ स्थान तुम्हारा। वहावर दाती नाम पुकारा॥

कई नाम है कई धाम है। यह स्थान भी तो सुखधाम है॥

हर मन्दिर में ज्योत तुम्हारी। कही योगेश्वरी महिमा न्यारी॥

हर जगह उत्सव होते रहते। हर मन्दिर में भगत है कहते॥

कत्यानी रक्षक काया की। ग्रंथि काटे मोह माया की॥

झूठे मोह से छुडाने वाली। अपना नाम जपाने वाली॥

बृहस्पतिवार को पूजा करिए। ध्यान कात्यानी का धरिये॥

हर संकट को दूर करेगी। भंडारे भरपूर करेगी॥

जो भी माँ को भक्त पुकारे। कात्यायनी सब कष्ट निवारे॥

मां कात्यायनी का पसंदीदा फूल

मां कात्यायनी को लाल रंग के पुष्प ख़ासकर गुलाब बहुत पसंद हैं इसलिए उनकी पूजा करते समय उन्हें लाल गुलाब और लाल रंग के अन्य पुष्प ज़रूर अर्पित करें।

शुभ रंग

चैत्र नवरात्र की षष्ठी तिथि इस बार सोमवार को है जिसका शुभ रंग सफ़ेद है। इसलिए इस दिन मां की कृपा प्राप्त करने के लिए सफ़ेद रंग के वस्त्र धारण करें। सफेद रंग आंतरिक अनुभूति और शांति का प्रतीक है। यह कभी अपना अशुभ प्रभाव नहीं छोड़ता। सफेद रंग के प्रयोग से व्यक्ति के स्वास्थ्य में भी फ़र्क आता है।  


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