जानिए, सुखद वैवाहिक जीवन के लिए राशि एवं कुंडली अनुसार विशेष पूजायें

Indian Astrology | 21-Nov-2019

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आजकल प्रायः शादी विवाह लगने के पहले वर-वधु या लड़के लड़की की कुंडली का मिलान किया जाता है, और इस मिलान के बाद ही तय होता है की लड़का और लड़की की कुंडली विवाह के उपयुक्त है या नहीं। अगर अधिक गुण मिलते है तो विवाह उत्तम माना जाता है। हिन्दू धर्म के अनुसार कुंडली मिलान करवाना बहुत जरुरी होता है। अगर कुंडली में थोड़ी बहुत ऊँच नीच हो तो ज्योतिष या वैदिक रीती रिवाजों से उसे ठीक किया जा सकता है। आज हम आपको कुंडली मिलान के बारे में बताने जा रहे है।

कुंडली मिलान की जानकारी-

  • कुंडली में मुख्य रूप से मंगल दोष पर खास विचार किया जाता है। अगर जन्म कुंडली में प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश स्थान में मंगल हो तो कुंडली में मंगल दोष माना जाता है।
  • यदि कुंडली में लग्न, चंद्र और कभी-कभी शुक्र की राशि से भी मंगल की उपरोक्त स्थितियों का विचार किया जाता है। मंगल दोष युक्त अथवा शनि दोष युक्त कुंडली ही विवाह संबंध के लिए सही मानी जाती है। इसलिए इन बातों का जरुर ध्यान रखें।
  • यदि मंगल अपनी उच्च राशि मकर में, स्वराशि मेष या वृश्चिक में या मित्र सूर्य की राशि सिंह में, गुरु की राशि धनु या मीन में से किसी भी राशि में स्थित हो तो वह अधिक दोषकारक नहीं होता है। यदि मंगल का गुरु पूर्ण दृष्टि 5, 7, 9 वीं से देखता हो तो भी मंगलदोष नष्ट हो जाता है।
  • जन्म कुंडली में प्रथम, चतुर्थ, सप्तम और द्वादश भाव में स्थित मंगल के सप्तम स्थान पर पूर्ण दृष्टि व् स्थिति होने के कारण वह अधिक दुष्प्रभाव करता है लेकिन वस्तुतः मंगल दोष का अर्थ क्या है? सप्तम स्थान प्रजनन-अवयव और दाम्पत्य कामोपभोग का निर्देशक स्थान है।
  • अष्टम स्थान जीवनसाथी यानी की पति-पत्नी का कुटुंब स्थान है। उस पर प्रथम या द्वितीय भाव में मंगल की यह दृष्टि का पड़ना कुटुंब सुख में बाधक बनता है। किन्तु उस पर गुरु की दृष्टि या युति से यह दोष नष्ट हो जाता है।
  • कुंडली मिलान का विचार करते समय वर-वधु दोनों की कुंडलियों के लग्न के स्वामी और चंद्र राशि के स्वामी परस्पर मित्र होने पर भी षडाष्टक योग या द्विदार्दाश योग नहीं होना चाहिए। एक कुंडली में संतान योग और दूसरी कुंडली में वन्ध्यत्व योग हो तो उसका परस्पर विवाह नहीं करना चाहिए। एवं एक में उत्साह, चैतन्य और दुसरे में जड़ता, दरिद्र होने से वह संबंध भी वर्जित होना चाहिए।
  • यदि वर-वधु सिंह और कुंभ राशि में हो तो कभी मेल नहीं हो सकता। भले ही इन राशि वाली कुंडलियों के ग्रह असामान्य रूप से अच्छे ही क्यों न हो अतः उनकी कुंडलियों के द्वादश भाव का सम्पूर्ण विचार किये बिना विवाह संबंध की राय नहीं देनी चाहिए।

विवाह के दिन अपनी राशि अनुसार करें पूजन-

जिनका विवाह होने वाला है, वह जातक क्या करें या किस देवी-देवता का पूजन करें, ताकि उनके गृहस्थ जीवन में सुख, शांति व वैभव बना रहे। आइए जा‍नते हैं : –

  • मेष- इस राशि वाले जातक को भगवान गणेशजी के दर्शन करने चाहिए एवं ‘गं गणपतये नम:’ की 9 माला जाप करना चाहिए।
  • वृषभ- इस राशि वाले जातक को कन्या का पूजन करना चाहिए एवं दुर्गा चालीसा का पाठ करना चाहिए।
  • मिथुन- इस राशि वाले जातक को शि‍वशक्ति की आराधना करनी चाहिए।
  • कर्क- इस राशि वाले जातक को गुरु के दर्शन करने चाहिए एवं शिवाष्टक या शिव चालीसा का पाठ करना चाहिए।
  • सिंह- इस राशि वाले जातक को प्रात: सूर्य दर्शन करने चाहिए एवं आदित्यह्रदयस्तोत्रम का पाठ करना चाहिए।
  • कन्या- इस राशि वाले जातक को माताजी (दुर्गा) के दर्शन करने चाहिए एव गणेश चालीसा का पाठ करना चाहिए।
  • तुला- इस राशि वाले जातक को राधा कृष्ण के दर्शन करने चाहिए एवं कृष्णाष्टक या ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ की माला जाप करना चाहिए।
  • वृश्चिक- इस राशि वाले जातक को शिवजी के दर्शन करने चाहिए एवं शिव के द्वादश नाम का उच्चारण करने चाहिए (बारह ज्योतिर्लिंग का नाम उच्चारण करें)।
  • धनु- इस राशि वाले जातक को दत्त भगवान के दर्शन करने चाहिए एवं गुरु का पाठ करना चाहिए।
  • मकर- इस राशि वाले जातक को हनुमानजी के दर्शन करना चाहिए एवं हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए।
  • कुंभ- इस राशि वाले जातक को राम-सीता के दर्शन करने चाहिए एवं रामरक्षा स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।
  • मीन- इस राशि वाले जातक को श्री गणेश या सांईं बाबा के दर्शन करने चाहिए एवं ‘बृं बृहस्पते नम:’ की 9 माला जाप करना चाहिए।
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