निर्जला एकादशी विशेष – महत्व, कथा एवं पूजा विधि

Future Point | 06-Jun-2019

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हिन्दू पंचांग के अनुसार जेष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को निर्जला एकादशी कहते हैं इसके अलावा इसे भीमसेन या पांडव एकादशी के नाम से भी कहा जाता है, पौराणिक मान्यता के अनुसार भोजन संयम न रखने वाले पांच पांडवों में से एक भीमसेन ने इस व्रत का पालन कर सुफल पाये थे इसीलिए इसका नाम भीमसेनी एकादशी भी पड़ा, निर्जला एकादशी का व्रत अत्यंत सयंम व साध्य मन से किया जाता है.

ऐसी मान्यता है कि वर्ष की सभी चौबीस एकादशियों में से निर्जला एकादशी सबसे अधिक महत्वपूर्ण एकादशी है, बिना पानी के व्रत को निर्जला व्रत कहते हैं और निर्जला एकादशी का उपवास किसी भी प्रकार के भोजन और पानी के बिना किया जाता है, उपवास के कठोर नियमों के कारण सभी एकादशी व्रतों में निर्जला एकादशी व्रत सबसे कठिन होता है, निर्जला एकादशी व्रत को करते समय श्रद्धालु लोग भोजन ही नहीं बल्कि पानी भी ग्रहण नहीं करते हैं, जो श्रद्धालु साल की सभी चौबीस एकादशियों का उपवास करने में सक्षम नहीं है उन्हें केवल निर्जला एकादशी उपवास करना चाहिए क्योंकि निर्जला एकादशी उपवास करने से दूसरी सभी एकादशियों का लाभ मिल जाता हैं।

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निर्जला एकादशी का महत्व -

हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार निर्जला एकादशी का बहुत ही विशेष महत्व होता है, और निर्जला एकादशी व्रत का मात्र धार्मिक महत्त्व ही नहीं है, इसका मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य के नज़रिए से भी बहुत महत्त्व होता है, एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की आराधना को समर्पित होता है, इस दिन जल कलश, गौ का दान बहुत पुण्य देने वाला माना गया है। यह व्रत मन को संयम सिखाता है और शरीर को नई ऊर्जा देता है, निर्जला एकादशी का व्रत पुरुष व महिलाओं दोनों द्वारा किया जा सकता है, वर्ष में अधिक मास की दो एकादशियों सहित 26 एकादशी व्रत का विधान है, जहाँ साल भर की अन्य 25 एकादशी व्रत में आहार संयम का महत्त्व है, वहीं निर्जला एकादशी के दिन आहार के साथ ही जल का संयम भी ज़रूरी है होता है, निर्जला एकादशी व्रत में जल ग्रहण नहीं किया जाता है यानि निर्जल रहकर व्रत का पालन किया जाता है।

निर्जला एकादशी की कथा -

पौराणिक कथाओं के अनुसार पाण्डवों में दूसरा भाई भीमसेन खाने -पीने का अत्यधिक शौक़ीन था और अपनी भूख को नियन्त्रित करने में सक्षम नहीं था इसी कारण वह एकादशी व्रत को नही कर पाता था, भीम के अलावा बाकि पाण्डव भाई और द्रौपदी साल की सभी एकादशी व्रतों को पूरी श्रद्धा व भक्ति से किया करते थे और भीम सेन अपनी इस लाचारी और कमजोरी को लेकर परेशान होता था, भीम सेन को लगता था कि वह एकादशी व्रत न करके भगवान विष्णु जी का अनादर कर रहा है, अपनी इस दुविधा से उभरने के लिए भीमसेन महर्षि व्यास के पास गए तब महर्षि व्यास ने भीम सेन को साल में एक बार निर्जला एकादशी व्रत को करने कि सलाह दी और कहा कि निर्जला एकादशी साल की चौबीस एकादशियों के तुल्य है, इसी पौराणिक कथा के बाद निर्जला एकादशी भीमसेनी एकादशी और पाण्डव एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हो गयी।

The Satyanarayan Puja is performed in strict accordance with all Vedic rules & rituals as prescribed in the Holy Scriptures.


2019 में निर्जला एकादशी तिथि एवं मुहूर्त -

  • इस वर्ष 2019 में निर्जला एकादशी 13 जून को पड़ रही है।
  • पारण का समय – 14 जून को प्रातः 05:27 से 08:13 बजे तक ।
  • एकादशी तिथि आरंभ – 12 जून को प्रातः 06:27 बजे से।
  • एकादशी तिथि समाप्त – 13 जून प्रातः 04:49 बजे को ।

निर्जला एकादशी व्रत की विधि -

  • निर्जला एकादशी के व्रत करने वाले साधक को दशमी तिथि से ही व्रत की सभी तैयारियां कर लेनी चाहिए।
  • निर्जला एकादशी के व्रत में ब्रह्मचर्य का पालन करना बहुत ही आवश्यक होता है, इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
  • निर्जला एकादशी के दिन साधक को गंगा नदी में स्नान अवश्य करना चाहिए और इसके पश्चात् हाथ में जल लेकर निर्जला एकादशी के व्रत का संकल्प करना चाहिए।
  • व्रत के लिए पीली चौकी या किसी चौकी पर साफ पीले रंग का वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करके उन्हें प्रणाम करें।
  • भगवान विष्णु जी की प्रतिमा स्थापित करने के बाद लाल पुष्प की माला , अक्षत , फल व नैवेध भगवान विष्णु जी को अवश्य अर्पण करें।
  • भगवान विष्णु जी के ‘ॐ नमो वासुदेवाय’ का जाप या विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ अवश्य करना चाहिए।
  • निर्जला एकादशी के दिन गाय का दान करना बहुत लाभकारी माना जाता है इसलिए गौ -दान अवश्य करना चाहिए।
  • निर्जला एकादशी के पूरे दिन व्रत के नियमों का पालन करें और रात भगवान विष्णु का कीर्तन करना चाहिए।
  • द्वादशी तिथि को प्रात: काल सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करकर भगवान विष्णु जी की पूजा करें और पूजा में तुलसी का प्रयोग अवश्य करना चाहिए।
  • इसके पश्चात् व्रत का पारण करना चाहिए ।
  • इस बात का ध्यान अवश्य रखे कि कोई भी व्रत तब तक पूरा नहीं होता जब तक की दान न दिया जाए इसलिए किसी निर्धन व्यक्ति या किसी ब्राह्मण को अपनी श्रद्धा के अनुसार दान जरूर दें ताकि आपका व्रत सफल हो सके ।