सात सुरों के सात ग्रह - जीवन संगीत

Rekha Kalpdev | 24-Apr-2019

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भारतवर्ष प्राचीनकाल से ही विश्व गुरु रहा है। भारत को विश्वगुरु बनाने में तीन शास्त्रों ने विशेष भूमिका निभाई है। इन्हें यदि भारतीय संस्कृति का मुख्य आधारस्तंभ भी कहा जाए तो अतिशोक्ति नहीं होगी। यह तीन विद्याएं निम्न हैं-

    Ø वैदिक ज्योतिष - जिसमें मुख्य रुप से गणित गणना और फलित ज्योतिष को शामिल किया जाता है।

    Ø वैदिक आयुर्वेद - जिसमें विभिन्न प्राकृतिक जड़ी बूटियों का प्रयोग करते हुए स्वास्थ्य उपचार किया जाता है।

    Ø संगीत शास्त्र - जिसका वर्णन विशेष रुप से सामवेद में हुआ है। यह नाद योग के नाम से भी जाना जाता है।

संगीत की उत्त्पति धरा पर कब से हुई? शायद तब से जब से मनुष्य में चेतना जागृत हुई होगी। मानव विकास में संगीत की भूमिका एक सहयोगी की रही है। जीवन का सुख हों या दुख हों संगीत मनुष्य के साथ कल भी था, आज भी हैं और आने वाले कल में भी रहेगा। दोनों को एक दूसरे का पूरक भी कहा जा सकता है। यह शाश्वत सत्य है कि सभी व्यक्तियों का जीवन ग्रहों के द्वारा नियंत्रित हैं। जीवन की छोटी घटना हों या बड़ी सभी ग्रह स्थितियों के द्वारा प्रभावित होती है। किसी प्रसिद्ध विद्वान व्यक्ति ने अपनी एक शोध के यह स्पष्ट किया है कि जब ग्रह अंतरिक्ष में भ्रमण करते हैं तो वे एक विशेष प्रकार की अलग अलग ध्वनियां उत्पन्न करते हैं। ग्रह, नक्षत्र और अन्य अन्य पिण्ड भी किसी न किसी प्रकार की ध्वनि उत्सर्जित करते है। इन्हीं ध्वनियों के मेल से संगीत का जन्म होता है। इन ध्वनियों को जब एक लय, ताल और सुर में बांधा जाता है तो मनुष्य मन आनंदित हो, अपने दुखों को भूल जाता है।

सामवेद के अनुसार संगीत के माध्यम से जीवन में मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है। यह मोक्ष प्राप्ति का सरल, सहज और सबसे उत्त्म साधन है। ग्रह शांति और रोगों का उपचार रागों के गायन से किया जा सकता है। संगीत मन पर इतना गहरा प्रभाव डालता है कि इसका प्रभाव सीधा ह्र्दय एवं चित्त पर अंकित होकर शांति देता है। जिस संगीत को सुनने से व्यक्ति विशेष को सबसे अधिक सुख-शांति का अनुभव हो वही वास्तव में उसके जीवन का असली संगीत है, जीवन की औषधि है, आनंद का मार्ग है। प्राचीन विचारक पायथागोरस ने तो यहां तक कहा कि ग्रह भ्रमण से निकलने वाली ध्वनियां ही वास्तव में सात सुर हैं। सात ग्रहों से निकलने वाला सुर व्यक्ति की कुंडली में लयात्मक हो तो जीवन सुखमय और लयहीन होने पर दुखों का अथाह सागर हो जाता है।

ज्योतिष और संगीत परस्पर जुड़े हुए हैं और दोनों का उपयोग समस्याओं से निपटने के उपाय के रूप में किया जाता है। संगीत सामवेद का हिस्सा है, जबकि ज्योतिष एक उपवेद और वेदांग है, जो भगवान शिव, सूर्य के एक अवतार द्वारा शासित हैं। सूर्य को शिव के रूप में और चंद्रमा को पार्वती द्वारा शासित किया गया है। प्राचीन काल से ग्रहों की पीड़ा के लिए संगीत का उपयोग माध्यम के रूप में किया जाता रहा है। ब्रह्माण्ड को पहला नाद ब्रह्म या आदिम ध्वनि कहा जाता है क्योंकि यह ध्वनि या सबदा से बनाया गया था।

संगीत में सात स्वर है- सा रे ग म प ध नि और सात ग्रह - सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि।

उपरोक्त्त सातों ग्रह और उनके सात स्वर इस प्रकार है—

    Ø सा-सूर्य ग्रह के लिए

    Ø रे-बुध ग्रह के लिए

    Ø ग स्वर शुक्र ग्रह के लिए

    Ø म स्वर मंगल के लिए

    Ø प स्वर चंद्र के लिए

    Ø ध स्वर के लिए गुरु ग्रह

    Ø नि स्वर शनि ग्रह का है।

अब हम यदि वैदिक ज्योतिष की बात करें तो ग्रह नौ है। उसमें भी सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि सात ही ग्रह हैं बाकि राहु व केतु दोनों काल्पनिक ग्रह है। ये दोनों वास्तविक ग्रह नहीं है। जिसमें सूर्य एवं चंद्र ग्रह के अतिरिक्त अन्य सभी ग्रहों को दो-दो ग्रहों का स्वामित्व दिया गया है। सात ग्रहों में से भी सूर्य और चंद्र सबसे अधिक महत्वपूर्ण ग्रह है। संगीत विद्या के अनुसार सा स्वर को सबसे अधिक स्थान दिया गया है। इस स्वर को सभी स्वरों का पिता भी कहा जा सकता हैं ठीक इसी प्रकार सूर्य ग्रह है, जो पिता का कारक ग्रह है। सा स्वर से ही अन्य स्वरों की स्थिति निर्धारित की जाती है।

अब अन्य स्वरों का सम्बन्ध देखते है। ऋषभ ‘रे’ स्वर ‘सा’ के निकट है। सा का स्वामी रवि है, इसलिए रे का स्वामी बुध ठहरता है। इसके बाद ‘ग’ स्वर आता है। बुध के बाद का गृह शुक्र है अर्थात् ‘ग’ का स्वामी शुक्र हुआ। अब ‘म’ अर्थात् इसका स्वामी मंगल है। इसके बाद ‘प’ का स्वामी चन्द्र पहले ही निश्चित हो चूका है। ‘प’ के बाद ‘ध’ आता है इस स्वर का स्वामी गुरु है। ‘नि’ अर्थात् निषाद ‘सा’ से सर्वाधिक अंतराल पर है और सूर्य भी शनि से सर्वाधिक दूरी पर स्थित है, इसलिए ‘नि’ स्वर का स्वामी शनि हुआ।

आईये अब जाने की सात स्वरों का प्रयोग करते हुए सात ग्रहों की अशुभता को किस प्रकार दूर कर जीवन को लयात्मक संगीत दिया जा सकता है।- उदाहरण के लिए यदि जन्मपत्री में शनि पीड़ित हों तो नि स्वर से युक्त राग एवं संगीत सुनना लाभप्रद सिद्ध हो सकता है। संगीत विद्या को उपचार के रुप में भी प्रयोग किया जा सकता हैं। जैसा कि हम जानते है कि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रत्येक रोग या कष्ट का कारण हमारी जन्मकुंड्ली में स्थिति ग्रहों में निहित होता है।

ग्रहों का उपचार करने से जातक के ग्रह दोष दूर होते हैं और जीवन सुखमय होता है। यदि किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में किसी ग्रह के फलस्वरुप कोई रोग हैं या रोग होने के योग बने हुए हैं तो संबंधित व्यक्ति को उस ग्रह के राग के गीत-संगीत सुनाने से रोग में कमी होती हैं और जातक जल्द ही स्वास्थ्य को प्राप्त करता है। ज्योतिषीय उपायों में मंत्रों के द्वारा ग्रह शांति इसी प्रक्रिया का एक भाग कही जा सकती है। एक लयबद्ध सुर में ओऽम्‌ का उच्चारण शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शांति प्रदान कर आरोग्यता देता है। इसका उच्चारण सिद्धिदायक और चमत्कारिक फल देने की क्षमता रखता है।

आयुर्वेद विद्या में मुख्यत: वात-पित्त-कफ संतुलन पर आधारित विद्या है और संगीत विद्या यह कहती है कि इन तीनों को संगीत चिकित्सा के द्वारा भी संतुलित किया जा सकता है। संगीत चिकित्सा के अनुसार जो ध्वनि ऊंची और असमान हों उसका सीधा संबंध वात प्रकृति पर पड़्ता है। गंभीर और स्थिर प्रकार की ध्वनियां पित्त प्रकृति पर असर डालती हैं और कोमल एवं मृदु ध्वनियों के द्वारा कफ तत्व को संतुलित किया जा सकता है। संगीत चिकित्सा का प्रयोग कर यदि वात-पित्त-कफ को संतुलित कर दिया जाए तो व्यक्ति में कोई भी रोग होने की संभावनाएं लगभग समाप्त हो जाएंगी।

योग में कुंड्लिनी जागरण में सांसों को अन्तर्मन से जोड़ा जाता है, अंतर्मन से जुड़ने पर ऋणात्‍मक संवेग कम होते हैं और धनात्‍मक संवेगों में स्थिरता आती है. इस प्रक्रिया से शारीरिक, मानसिक और सामाजिक सभी प्रकार के विकार दूर होते है. पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान श्री कृष्ण की बांसुरी वादन से गायें स्वयं एकत्रित हो जाती थी. संगीत का प्रभाव सिर्फ मनुष्य जाति पर ही नहीं होता हैं बल्कि यह सभी सजीव वस्तुओं पर अपना प्रभाव छोड़ता है. जीव-जन्तु, पेड़ पौधे और जानवरों पर भी इस चिकित्सा पद्वति का प्रयोग किया जा सकता है. इसके अनेकों उदाहरण आजकल अक्सर खबरों की सूर्खियां बनता रहता हैं. आईये अब हम कुछ रोग और रागों के बारे में बात करते हैं. इन रागों का उपयोग रोग निवारण के लिए किया जा सकता है-

    Ø हृदय रोग - ह्र्दय रोग के निवारण के लिए राग दरबारी अथवा सारंग आधारित गीत-संगीत सुनना अदभुत फल देता है.

    Ø राग आधारित गीत - झनक झनक तोरी बाजे पायलिया, राधिके तूने बंसरी चुराई, जादूगर सइयां छोड़ मोरी.

    Ø अनिद्रा - राग भैरवी और राग सोहनी की गीत-संगीत सुनने से अनिद्रा रोग में कमी होती है.

    Ø राग आधारित गीत - तू गंगा की मौज मैं यमुना, झूमती चली हवा और नाचे मन मोरा.

    Ø एसिडिटी – रोग में कमी करने के लिए रोगी को राग खमाज सुनाना चाहिए.

    Ø राग आधारित गीत - आयो कहाँ से घनश्याम, तकदीर का फसाना गाकर किसे सुनाये, छूकर मेरे मन को.

    Ø याददाश्त – इसके लिए राग शिवरंजनी सुनना चाहिए.

    Ø राग आधारित गीत - जाने कहाँ गए वो दिन, ना किसी की आँख का नूर हूँ, दिल के झरोखे मे तुझको.

    Ø रक्त अल्पता - राग पीलू सुनना चाहिए.

    Ø राग आधारित गीत - नदिया किनारे, खाली हाथ शाम आई है, आज सोचा तो आँसू भर आए.

    Ø अवसाद - राग बिहाग और मधुवंती सुनने पर अवसाद से बाहर आने में सहयोग मिलता है.

    Ø राग आधारित गीत - दिल जो ना कह सका, पिया बावरी.

    Ø रक्तचाप - राग भूपाली को सुनने पर उच्च और निम्न रक्तचाप नियंत्रित किया जा सकता है.

    Ø राग आधारित गीत - चल उडजा रे पंछी कि अब ये देश, पंख होते तो उड़ आती रे, चलो दिलदार चलो.

    Ø अस्थमा – राग मालकोस और ललित सुनने पर अस्थमा रोग में कमी होती है.

    Ø राग आधारित गीत - तू छुपी हैं कहाँ, आधा है चंद्रमा, एक शहँशाह ने बनवा के हंसी ताजमहल