संकष्टी चतुर्थी 2019 की तिथियाँ, महत्व, कथा एवं पूजा विधि ।

Future Point | 29-Apr-2019

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संकष्टी चतुर्थी को वक्रतुंडी चतुर्थी, माघी चौथ और तिलकुट चौथ व्रत भी कहा जाता है, उत्तर भारत समेत मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में इस व्रत को पूरी श्रद्धा के साथ रखा जाता है. हिन्दू कैलेंडर के अनुसार प्रत्येक महीने में दो चतुर्थी आती है, अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष में आने वाली चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहा जाता है इसके अलावा पूर्णिमा के बाद यानि कृष्ण पक्ष में आने वाली चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है।

2019 में पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी की तिथियाँ व चंद्रोदय का समय –

◘ 24 जनवरी दिन गुरुवार – चंद्रोदय समय 9 बजकर 32 मिनट पर ।

◘ 22 फ़रवरी दिन शुक्रवार – चंद्रोदय समय 9 बजकर 21 मिनट पर ।

◘ 24 मार्च दिन रविवार – चंद्रोदय समय 10 बजकर 8 मिनट पर।

◘ 22 अप्रैल दिन सोमवार – चंद्रोदय समय 9 बजकर 55 मिनट पर ।

◘ 22 मई दिन बुधवार – चंद्रोदय समय 10 बजकर 28 मिनट पर ।

◘ 20 जून दिन गुरुवार – चन्द्रोदय समय 9 बजकर 54 मिनट पर ।

◘ 20 जुलाई दिन शनिवार – चंद्रोदय समय 9 बजकर 46 मिनट पर ।

◘ 19 अगस्त दिन सोमवार – चंद्रोदय का समय 9 बजकर 22 मिनट पर ।

◘ 17 सितम्बर दिन मंगलवार – चंद्रोदय समय 8 बजकर 24 मिनट पर ।

◘ 17 अक्टूबर दिन गुरुवार – चंद्रोदय समय 8 बजकर 17 मिनट पर ।

◘ 15 नवम्बर दिन शुक्रवार – चंद्रोदय समय 7 बजकर 47 मिनट पर ।

◘ 15 दिसम्बर दिन रविवार – चंद्रोदय समय 8 बजकर 33 मिनट पर ।


संकष्टी चतुर्थी व्रत का महत्व -

संकष्टी का मतलब संकट हरी है यानी संकटों का हरण करने वाली चतुर्थी। इस व्रत से विघ्नहर्ता गणेश बड़े प्रसन्न होते हैं। महिलाएं अपने पुत्रों की मंगलकामना और दीर्घायु के लिए इस दिन निर्जला व्रत रखती हैं। भगवान गणेश की प्रथम पूज्‍य देवता के रूप में आराधना की जाती है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले भगवान गणपति की आराधना की जाती है। संकष्‍टी व्रत में भी भगवान गणेश की पूजा के साथ उपवास रखा जाता है और कथा सुनाई जाती है।

इस दिन महिलाएं सुबह स्‍नान के पश्‍चात निर्जला व्रत रखती हैं। चंद्र दर्शन के बाद उपवास तोड़ सकते हैं। कई स्‍थानों पर महिलाएं इस दिन कुछ नहीं खातीं। वहीं कुछ स्‍थानों पर महिलाएं व्रत तोड़ने के बाद खिचड़ी मूंगफली और फलाहार करती है। इस दिन शकरकंद खाने का सबसे ज्‍यादा महत्‍व होता है।


संकष्टी चतुर्थी की कथा -

यह कथा सत्ययुग कि है यहां महाराज हरिश्चंद्र के नगर में एक कुम्हार निवासी था. एक बार उसने अपने दैनिक कार्य के अनुसार कुछ बर्तन बनाएं और फिर उनको आग में पकाया (आंवा) लगाया. लेकिन उस दिन उस कुम्हार का बनाया एक भी बर्तन पका नहीं. ऐसे में उस कुम्हार ने अपना नुकसान होते हुए एक तांत्रिक से सलाह ली, उस तांत्रिक ने कुम्हार को बताया कि तुमको किसी की बलि देने की तब जाकर तेरी समस्या का निवारण होगा. ऐसे में अपनी समस्या से निजात पाने के लिए कुम्हार ने तपस्वी ऋषि शर्मा के देहांत के बाद बेसहारा हुए उनके पुत्र की सकट चौथ के दिन बलि दे दी उस लड़के की माता ने उस दिन भगवान गणेश की पूजा की थी. दिन भर अपने पुत्र की तलाश मे वह महिला भटकती रही और पुत्र न मिलने पर उस स्त्री ने भगवान गणेश से प्रार्थना की. ऐसें में सुबह के समय कुम्हार ने उस लड़के को जीवित देख डर की वजह से राजा के समक्ष अपना गुनाह कबूल कर लिया था. जब राजा ने उस वृद्ध महिला से इस चमत्कार के बारे में पूछा तो तब उस स्त्री ने गणेश पूजा के बारे में बताया. उसके बाद राजा ने सकट चौथ की महिमा को स्वीकारते हुए पूरे नगर में गणेश पूजा करने का आदेश दिया. उस दिन से लेकर अब तक हिंदू धर्म में संकष्टी चतुर्थी को खास पर्वों में से एक माना जाता है. हर साल होली के पावन पर्व के बाद सकट चौथ के इस उत्सव को बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है. इस दिन महिलाऐं संकष्टी चतुर्थी पर निर्जला व्रत रख कर अपनी बच्चों की सलामती के लिए भगवान गणेश की आराधना करती है.


संकष्टी चतुर्थी व्रत की पूजन विधि -

◘ सबसे पहले सुबह स्नान कर साफ और धुले हुए कपड़े पहनें. पूजा के लिए भगवान गणेश की प्रतिमा को ईशानकोण में चौकी पर स्थापित करें. चौकी पर लाल या पीले रंग का कपड़ा पहले बिछा लें.

◘ भगवान के सामने हाथ जोड़कर पूजा और व्रत का संकल्प लें और फिर उन्हें जल, अक्षत, दूर्वा घास, लड्डू, पान, धूप आदि अर्पित करें. अक्षत और फूल लेकर गणपति से अपनी मनोकामना कहें, उसके बाद ओम गं गणपतये नम:’ मंत्र बोलते हुए गणेश जी को प्रणाम करें.

◘ इसके बाद एक थाली या केले का पत्ता लें, इस पर आपको एक रोली से त्रिकोण बनाना है.

◘ त्रिकोण के अग्र भाग पर एक घी का दीपक रखें. इसी के साथ बीच में मसूर की दाल व सात लाल साबुत मिर्च को रखें.

◘ पूजन उपरांत चंद्रमा को शहद, चंदन, रोली मिश्रित दूध से अर्घ्य दें. पूजन के बाद लड्डू प्रसाद स्वरूप ग्रहण करें.