हस्तसंरचना का वैज्ञानिक पक्ष

Arun Bansal | 15-Apr-2015

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हस्तसंरचना का वैज्ञानिक पक्ष

गर्भधारण होने के चार सप्ताह पश्चात् हाथों की रचना होनी आरम्भ हो जाती है। चैथे महीने के पश्चात् हाथों में मुख्य रेखाएं, उभार, उंगलियां व हथेली की रचना की प्रक्रिया सम्पन्न हो जाती है और यह आकृति जीवनपर्यन्त वैसी ही रहती है। इस प्रकार से हमारे ये हाथ गर्भ में हमारे जीवन का एक प्रकार का फाॅसिल रिकाॅर्ड होते हैं।

चिकित्सा विज्ञान का मानना है कि हथेली पर मुख्य रेखाएं ढाई से तीन महीने के गर्भ में ही बन जाती हैं, और सूक्ष्म रेखाएं, जिन्हें फिंगर प्रिंट्स (माइक्रो लाइंस) कहते हैं, गर्भ में छः महीने के होते-होते पूर्ण रूप से विकसित हो जाती हैं। आयुर्विज्ञान का मानना है कि हस्तरेखाओं का विस्तृत ज्ञान 21वें क्रोमोजोम में छिपा होता है अर्थात् हमारी हस्तरेखाएं पूर्णतया आनुवांशिक आधार पर विकसित होती हैं।

आयुर्विज्ञान में शोध के अनुसार 21वें क्रोमोजोम में अनियमितता के कारण बच्चों में मानसिक अनियमितताएं पैदा हो जाती हैं और उनकी हस्तरेखाओं में मस्तिष्क रेखा एवं हृदय रेखा दोनों आपस में मिलकर एक रेखा बनाती हुई पाई जाती हैं। ऐसा जातक सनकी हो सकता है क्योंकि मेडिकल साइंस के अनुसार यह फेटल एल्कोहल सिंड्रोम और आनुवांशिक विषमताओं का लक्षण होता है। इस प्रकार की समस्या पुरुषों में महिलाओं की अपेक्षा दोगुनी होती है।


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आयुर्विज्ञान का ऐसा भी मानना है कि हृदय रेखा और मस्तिष्क रेखा आपस में तब जुड़ती हैं जब गर्भावस्था के प्रारंभ काल में माता को किसी भी प्रकार की मानसिक परेशानी या तनाव हो। यह सिद्ध करता है कि गर्भावस्था हस्तरेखाओं में बदलाव ला सकती है। यह सत्य भी है क्योंकि आनुवांशिक तथ्य तो हस्तरेखाओं का सृजन करते ही हैं, गर्भावस्था का लालन-पालन भी जातक के स्वास्थ्य एवं भविष्य को बदल सकता है।

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हस्तरेखा ज्ञान में हस्त पर जो क्षेत्र मस्तिष्क के जिस भाग को क्रियान्वित करता है उसके अनुसार हाथ के विभिन्न क्षेत्रों को विभिन्न ग्रहों से जोड़ दिया गया है। जैसे कि तर्जनी के नीचे के क्षेत्र को गुरु पर्वत कहा गया है क्योंकि इसका सीधा संबंध मस्तिष्क के ज्ञान बिंदु से है। मध्यमा के नीचे के क्षेत्र को शनि क्षेत्र कहा गया है क्योंकि यह मस्तिष्क के कर्म बिंदु से जुड़ा है। कनिष्ठिका का मस्तिष्क की वैज्ञानिक गणना के क्षेत्र से संबंध है, अतः इसके नीचे का क्षेत्र बुध पर्वत माना जाता है। अनामिका में दो शिराओं का समावेश है जबकि बाकी सभी उंगलियों में एक शिरा ही संचालन करती है। मस्तिष्क के अधिकांश भाग पर इसका नियंत्रण है।

इस तरह सभी उंगलियों में इसका महत्व सर्वाधिक है और यही कारण है कि इसे सूर्य की उंगली की उपाधि दी गई है। कदाचित इसीलिए अधिकांश रत्नों को इसी उंगली में धारण करने का विधान किया गया है और अंग्रेजी में रिंग फिंगर की उपाधि दी गई है। जप माला का फेरना, तिलक, पूजन आदि भी इसके महत्व के कारण इस उंगली से किए जाते हैं।

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अभी हाल ही में जीवविज्ञान की एक रिसर्च ने हाथों के कुछ रोचक तथ्यों को खोज निकाला जिनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण है तर्जनी व अनामिका उंगली का अनुपात व इसका टैस्टोस्टीयराॅन व एस्ट्रोजेन की मात्रा से सम्बन्ध। इसे डिजिट रेशियो ‘2D: 4D’ के नाम से जाना जाता है जिसे तर्जनी (2D) उंगली की लम्बाई को मापकर तथा उसे अनामिका (4D) उंगली की लम्बाई से भाग करके निकाला जाता है।

यही वह अनुपात है जिसका निर्धारण यौवनावस्था के पूर्व ही हो जाता है। पुरुषों की अनामिका उंगली उनकी तर्जनी से अधिकतर लम्बी पाई जाती है जबकि महिलाओं की तर्जनी उंगली प्रायः अधिक लम्बी होती है। अधिक सरल शब्दों में यह कहा जा सकता है कि अनामिका उंगली की लम्बाई का सीधा सम्बन्ध टैस्टोस्टीयराॅन व तर्जनी का एस्ट्रोजेन नामक हाॅरमोन से है।

यूरोप के लोगों में ‘2D: 4D’ अनुपात 1 से 0.96 तक रहता है जिसमें महिलाओं में यह अनुपात अधिक व पुरुषों में कम होता है अर्थात् पुरुषों की अनामिका उंगली अधिक बड़ी होती है व महिलाओं की तर्जनी उंगली अधिक लम्बी होती है।

परिणाम

  1. जिन पुरुषों का ‘2D: 4D’ अनुपात कम होता है वे अधिक सन्तानोत्पादक क्षमताओं से युक्त, आक्रामक तथा संगीत व खेल-कूद प्रेमी होते हैं।
  2. जिन पुरुषों का ‘2D: 4D’ अनुपात अधिक होता है उन्हें हृदय रोग होने की सम्भावनाएं रहती हैं।
  3. महिलाओं में ‘2D: 4D’ अनुपात कम होने की स्थिति में उनके अन्दर लेस्बियन/बाइसेक्सुअल होने की प्रवृत्ति अधिक पाई गई और ऐसी महिलाएं पुरुषों के समान आक्रामक व दृढ़-निश्चयी पाई गईं।
  4. महिलाओं में ‘2D: 4D’ अनुपात अधिक होने पर वे बेहतर संतानोत्पादक क्षमताओं से युक्त परन्तु उन्हें स्तन कैंसर का खतरा भी रहता है।
  5. स्किजोफ्रेनिया से पीड़ित अधिकतर पुरुषों व महिलाओं दोनों में ही ‘2D: 4D’ अनुपात अधिक पाया गया जबकि आॅटिज्म से ग्रस्त लोगों का यह अनुपात कम निकला।

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हाथों का रंग

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार कुछ अन्य तथ्य भी हैं जो हमें हाथों से प्राप्त हो सकते हैं। हाथों की शक्ल पर रंग के आधार पर हमारे स्वास्थ्य के बारे में कुछ जानकारी प्राप्त की जा सकती है -

    1. रक्त संचारण की धीमी प्रक्रिया से हथेलियों का रंग हल्का नीलापन लिए होता है।
    2. हथेली का लाल रंग लीवर में सीरोसिस नामक बीमारी का संकेत देता है।

नाखून

  1. डायबिटीज का संकेत आधे सफेद व आधे गुलाबी नाखूनों से मिलता है।
  2. नीले नाखून Heavy metal Poisining, रक्त संचार की समस्या तथा फेफड़ों व हृदय सम्बन्धी रोगों का संकेत देते हैं।
  3. पीले व हरे नाखून श्वांस सम्बन्धी समस्याओं को दर्शाते हैं।
  4. नाखूनों का उंगलियों के अग्रभाग में गोलाई लिए होना खून में आॅक्सीजन की कमी, फेफड़े, लीवर व आंतों के रोगों का संकेत है।

फिंगर प्रिंट

    1. एक अध्ययन के अनुसार (Alzheimer's) नामक बीमारी से ग्रस्त लोगों की उंगलियों के अग्रभाग में उल्नार लूप अधिक पाया गया।
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  1. हथेली में चक्र (Swirl) जेनेटिक डिसआॅर्डर के संकेतक हैं।

इस प्रकार हमारा हाथ माता के गर्भधारण के पश्चात से ही हमारे विकास को दर्शाता है व हमारे भविष्य का भी संकेतक होता है।


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